उमस भरे खतरनाक गर्म दिनों में से अधिकतर मानवजनित जलवायु परिवर्तन से जुड़े हैं- रिपोर्ट

पूरे उत्तर भारत में अब हर साल लगभग 30-40 खतरनाक उमस वाले दिन होते हैं। आगरा, लखनऊ, कानपुर, प्रयागराज, वाराणसी, गाजियाबाद, जयपुर, जोधपुर, कोटा, भोपाल, इंदौर, रांची और जमशेदपुर में भी इसी तरह की वृद्धि दर्ज की गई है।

क्लाइमेट सेंट्रल की ताजा रिपोर्ट में बताती है कि 1970 के दशक से दुनिया भर में खतरनाक उमस भरे दिनों की संख्या दोगुनी से ज्यादा हो गई है। भारत इस बढ़ते खतरे के प्रति सबसे अधिक असुरक्षित देशों में से एक है।

जलवायु परिवर्तन का यह बदलाव न सिर्फ गर्मियों को ज्यादा गर्म बना रहा है, बल्कि बढ़ती हुई उमस इसे और भी ज्यादा खतरनाक बना रही है। भारत के 59 शहरों सहित दुनिया भर के 961 शहरों के विश्लेषण से पता चलता है कि खतरनाक रूप से आर्द्र दिनों की औसत संख्या 1970-79 में जो सालाना 10 दिन थी, वह 2016 और 2025 के बीच बढ़कर 23 दिन हो गई है। रिपोर्ट बताती है कि 1970 के बाद से इन खतरनाक आर्द्र-गर्म दिनों में से 64% सीधे तौर पर मानवजनित जलवायु परिवर्तन से जुड़े हैं।

अध्ययन से यह भी पता चला है कि भारत के 50 शहर उन शहरों में शामिल हैं जहां खतरनाक उमस भरी गर्मी तेजी से बढ़ रही है। इनमे विशेष रूप से तटीय और घनी आबादी वाले इलाके हैं। भारत के लिए यह परिणाम चिंता बढ़ाते हैं। यहाँ बढ़ता तापमान और अधिक आर्द्रता के मिलने से हीट स्ट्रेस (गर्मी से होने वाले तनाव) का खतरा भी बढ़ रहा है।

ईटीवी भारत की एक खबर के अनुसार, दिल्ली यूनिवर्सिटी में असिस्टेंट प्रोफेसर और वरिष्ठ पर्यावरणविद् शैलेंद्र कुमार कहते हैं- ‘ऐसा इसलिए हो रहा है क्योंकि जलवायु परिवर्तन की वजह से तापमान और वायुमंडलीय आर्द्रता दोनों एक साथ बढ़ रहे हैं। अधिक गर्म वातावरण हर 1°C तापमान बढ़ने पर लगभग 7% ज्यादा जलवाष्प जमा कर सकता है, जिससे गर्मी बहुत ज्यादा महसूस होती है।’

प्रोफ़ेसर शैलेंद्र कुमार आगे बताते हैं- ‘तेजी से शहरीकरण, हरियाली का खत्म होना, कंक्रीट बनना, जलाशयों का सिकुड़ना, और नगरीय ऊष्मा द्वीप प्रभाव (Urban Heat Island Effect) गर्मी को और ज्यादा बढ़ा रहे हैं और शहरों को ठंडा होने से रोक रहे हैं, खासकर रात में। ये सब मिलकर वेट-बल्ब तापमान (Wet-bulb temperature) बढ़ा रहे हैं, जिससे शरीर की पसीने से खुद को ठंडा करने की क्षमता कम हो जाती है और गर्मी से जुड़ी बीमारियों और मौतों का खतरा काफी बढ़ जाता है। यह अब सिर्फ जलवायु का मुद्दा नहीं है, यह जन स्वास्थ्य, शहरी नियोजन और व्यावसायिक सुरक्षा की चुनौती है।’

इस रिपोर्ट के मुताबिक़, अकेले 2025 में, दुनिया में औसत 23 खतरनाक आर्द्रता वाले दिन रहे, जिनमें से 19 दिन (83%) जलवायु परिवर्तन की वजह से थे। अध्ययन में यह भी बताया गया है कि 2024 में दुनिया भर में सबसे ज्यादा 32 खतरनाक आर्द्रता वाले दिन रिकॉर्ड किए गए, जो ग्लोबल वार्मिंग के बढ़ते असर को दिखाता है।

रिपोर्ट में तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, महाराष्ट्र और पश्चिम बंगाल को उन राज्यों के तौर पर बताया गया है, जहां खतरनाक उमस भरी गर्मी में सबसे अधिक बढ़ोतरी देखी गई है। इसका असर अब सिर्फ तटीय इलाकों तक ही सीमित नहीं है। महाराष्ट्र में, मुंबई और नवी मुंबई में खतरनाक उमस वाले दिन हर साल 136 से बढ़कर 206 हो गए हैं, जबकि ठाणे और डोंबिवली में 182 से बढ़कर 222 दिन हो गए हैं।

पूरे उत्तर भारत में, दिल्ली, नई दिल्ली, नजफगढ़ और फरीदाबाद जैसे शहरों में अब हर साल लगभग 30-40 खतरनाक उमस वाले दिन होते हैं। आगरा, लखनऊ, कानपुर, प्रयागराज, वाराणसी, गाजियाबाद, जयपुर, जोधपुर, कोटा, भोपाल, इंदौर, रांची और जमशेदपुर में भी इसी तरह की वृद्धि दर्ज की गई है।

शोधकर्ताओं का कहना है कि तापमान में वृद्धि, मानसून की नमी और अर्बन हीट आइलैंड इफेक्ट के मेल से कई आंतरिक शहरों में उमस भरी गर्मी और भी खतरनाक हो रही है।हालांकि, अध्ययन में यह भी पाया गया कि भूगोल भी एक अहम भूमिका निभाता है। अध्ययन के समय के दौरान बेंगलुरु और श्रीनगर में खतरनाक उमस वाले दिन नहीं आए, जबकि पुणे जैसे अधिक ऊंचाई वाले शहरों में ऐसे दिन काफी कम रहे।

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