सुप्रीम कोर्ट ने युवा वकीलों को पैसों की तंगी के कारण पेशा बदलने से रोकने के लिए एक विशेष सहायता फंड बनाने का निर्देश दिया है। इस फंड से पहली पीढ़ी के वकीलों को शुरुआती सात साल तक मासिक वजीफा मिलेगा, जिसके लिए सीनियर वकीलों के दान और कोर्ट फीस का इस्तेमाल होगा।
आर्थिक तंगी के चलते अगर होनहार और युवा वकील वकालत छोड़ने से बचे रहें, इसके लिए ‘यंग लॉयर्स प्रोफेशनल असिस्टेंस फंड’ बनाया जाना चाहिए। यह विचार है देश की शीर्ष अदालत का। देश की शीर्ष अदालत ने जूनियर वकीलों के हक में एक बेहद मानवीय फैसला सुनाते हुए ‘ब्रेन ड्रेन’ की समस्या पर अंकुश लगाने का प्रयास किया है। मामले की अगली सुनवाई 17 जुलाई को होगी। कोर्ट ने अटॉर्नी जनरल आर वेंकटरमणी और राज्यों के एडवोकेट जनरल को भी मदद के लिए मौजूद रहने को कहा है।
सुप्रीम कोर्ट ने होनहार और युवा वकीलों को वकालत छोड़ने से बचाने के लिए केंद्र सरकार सहित सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को नोटिस जारी किया है। प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति वी मोहना की बेंच ने इस मामले में नोटिस जारी कर जवाब मांगा है।
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक़, यह आदेश महिला वकीलों के एक ग्रुप द्वारा दायर याचिका पर आया है। याचिका में युवा वकीलों के प्रारंभिक संघर्ष, पैसों की किल्लत और महिला अधिवक्ताओं के लिए सुरक्षित माहौल का मुद्दा उठाया गया था।
इस पर अदालत ने स्पष्ट कहा कि आर्थिक संकट किसी एक जेंडर का नहीं है। पहली पीढ़ी के वकीलों को शुरुआत में न तो कोई ऑफिस मिलता है, न लाइब्रेरी और न ही मुवक्किल। वे सीनियर्स या स्थानीय बार एसोसिएशनों से मिलने वाले बेहद कम वजीफे पर निर्भर रहते हैं। यह राशि बुनियादी खर्चों के लिए भी पूरी नहीं पड़ती।
मामले में महिला वकीलों की दिक्कतों को बहुत गंभीरता सेलेते हुए शीर्ष अदालत का कहना था कि महिला वकीलों को दिन का एक बड़ा हिस्सा कोर्ट परिसर में ही बिताना पड़ता है। इसलिए उनके आराम, गोपनीयता, सुरक्षा और काम के लिए बुनियादी सुविधाएं जुटाना बेहद जरूरी है। इसके बिना इस पेशे में महिलाओं की लंबी और मजबूत भागीदारी मुमकिन नहीं है।
सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में एक कानून बनाने का सुझाव दिया है। साथ ही कोर्ट ने इस फंड को चलाने की एक पूरी योजना भी पेश की है। यह फंड सीधे हाई कोर्ट या केंद्र सरकार द्वारा गठित किसी स्वायत्त संस्था के नियंत्रण में होना चाहिए साथ ही इस फंड में देश के सफल और सीनियर वकील अपनी तरफ से नियमित दान दें। दान देने वाले इन वकीलों को टैक्स छूट, नेशनल अवार्ड या अन्य सम्मान देकर प्रोत्साहन दिया जाए। इसके अलावा, केंद्र और राज्य सरकारें कोर्ट फीस का एक हिस्सा इस फंड में जमा कराएं तथा कोर्ट में लगने वाले जुर्माने की राशि को भी इसी फंड में डाला जा सकता है।
सहयोग के हवाले से कोर्ट ने ‘पे-इट-बैक’ मॉडल की बात भी कही है। इसके तहत जब ये वकील खुद स्थापित हो जाएं, तो वे किश्तों में इस पैसे को फंड में वापस लौटाएं। इससे आने वाली पीढ़ियों के लिए एक आत्मनिर्भर कोष बना रहेगा।
इस मदद को वकालत के सात साल पूरे होने तक जारी रखा जाएगा। वजीफा पाने वाले युवाओं को सीनियर वकीलों के साथ जुड़कर काम करना अनिवार्य होगा। पहली पीढ़ी के युवा वकीलों को इस योजना के तहत प्रत्येक माह वजीफा दिया जाएगा। शुरुआती तीन साल तक यह राशि इतनी होगी कि वे अपनी आजीविका चला सकें। इसके बाद अगले चार वर्षों में इस राशि को धीरे-धीरे घटाया जाएगा।