कामकाजी जीवन में हिंसा या उत्पीड़न से लाखों ज़िंदगियां ख़त्म हो जाती हैं- आईएलओ

आईएलओ यानि अन्तरराष्ट्रीय श्रम संगठन की एक नई रिपोर्ट में रोज़गार से जुड़े तथ्यों की जानकारी न सिर्फ चौंकाने वाली है बल्कि दहशत भी दिलाती है। आँकड़े बताते हैं कि कामकाज के लम्बे घंटे, रोज़गार की असुरक्षा, कार्यस्थल पर उत्पीड़न और डराने-धमकाने (bullying) जैसे जोखिमों से हर साल आठ लाख से अधिक लोगों की मृत्यु हो रही है।

वैश्विक घटनाक्रम और कार्रवाई के रास्ते नामक इस रिपोर्ट के अनुसार, जिस तरह से कामकाज की प्रकृति और स्वरूप तैयार किए जाते हैं, दैनिक स्तर पर कामकाज को किस तरह किया और कराया जाता है और प्रबन्धित किया जाता है, उसका, कामगारों के स्वास्थ्य और सुरक्षा पर बड़ा प्रभाव पड़ता है।

चिन्ता की बात ये है कि यह प्रभाव अब बढ़ता जा रहा है, जो हृदय रोग (cardiovascular disease) और आत्महत्या सहित मानसिक विकारों की बढ़ती दरों के रूप में सामने आ रहा है।

रिपोर्ट के लेखकों ने कामकाज के तीन परस्पर जुड़े क्षेत्रों पर ध्यान केन्द्रित किया है।
काम की प्रकृति: (मांग या अपेक्षाएँ, ज़िम्मेदारियाँ और कार्य)।
प्रबन्धन और संगठन: कामकाज को किस तरह व्यवस्थित और प्रबन्धित किया जाता है।
कार्यस्थल नीतियाँ: (जैसे कार्य प्रदर्शन और अच्छे कामकाज को पुरस्कृत करने के तरीक़े, और हिंसा व उत्पीड़न रोकने के नियम)।

रिपोर्ट तैयार करने वालों ने, कार्यस्थलों पर काम के दबाव, प्रयास और प्रोत्साहन के बीच असन्तुलन, रोज़गार की असुरक्षा, लम्बे समय तक काम करना और उत्पीड़न को देखते हुए, प्रति वर्ष 8 लाख 40 हज़ार लोगों की मौतें होने का अनुमान लगाया है।

वैज्ञानिक शोधों से मालूम होता है कि ये जोखिम, गम्भीर स्वास्थ्य स्थितियों की सम्भावना को किस तरह बढ़ाते हैं।

इस संख्या की सटीकता सुनिश्चित करने के लिए, जोखिम के इन स्तरों को, विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) और बीमारियों के वैश्विक बोझ नामकअध्ययन के नवीनतम आँकड़ों से भी मिलाया गया है जिसमें वैश्विक मृत्यु दर और स्वास्थ्य सम्बन्धी परिस्थितियों की जानकारी दी गई है।

इनमें से अनेक जोखिम तो लम्बे समय से मौजूद हैं, लेकिनआईएलओ, हाल के समय में कार्यस्थलों में हो रहे परिवर्तनों के प्रभावों को लेकर चिन्तित है। इन बदलावों में शामिल हैं, कामकाज करने के तरीक़ों का डिजिटल रूप, एआई, घर से कामकाज (Remote working) और कामकाज के नए तरीक़े।

यूएन श्रम एजेंसी का कहना है कि यदि इन परिस्थितियों या बदलावों पर ठीक से ध्यान नहीं दिया गया, तो ये हालात, मौजूदा समस्याओं को और अधिक गम्भीर बना सकते हैं या नई मुश्किलें पैदा कर सकते हैं।

सकारात्मक व स्वस्थ कामकाजी माहौल
आईएलओ में कामकाज सम्बन्धी नीतियों और प्रणाली मामलों की टीम लीडर मनाल अज़्ज़ी का कहना है, “आधुनिक कार्य जगत में व्यावसायिक सुरक्षा और स्वास्थ्य के लिए ‘मनोसामाजिक जोखिम’ सबसे महत्वपूर्ण चुनौतियों में से एक बनते जा रहे हैं।”

रिपोर्ट इस बात पर ज़ोर देती है कि यदि मूल कारणों पर ध्यान दिया जाए और मनोसामाजिक जोखिम प्रबन्धन को व्यावसायिक सुरक्षा प्रणालियों में समाहित किया जाए, तो इन मौतों को रोका जा सकता है। इसके लिए सरकारों, नियोक्ताओं और श्रमिकों के बीच सामाजिक संवाद आवश्यक है।

रिपोर्ट का निष्कर्ष है कि देश और उद्यम, सक्रिय रूप से इन जोखिमों को दूर करके, ऐसे स्वस्थ कार्यस्थल बना सकते हैं जो श्रमिकों और संगठनों दोनों को लाभ पहुँचाएँ, साथ ही उत्पादकता और आर्थिक लचीलेपन को भी मजबूत करते हैं।

रिपोर्ट की कुछ मुख्य बातें
वैश्विक स्तर पर 23 प्रतिशत श्रमिकों ने अपने कामकाजी जीवन में, हिंसा या उत्पीड़न के कम से कम एक रूप का सामना किया है।

मनोसामाजिक जोखिमों के कारण हर साल लगभग 4.5 करोड़ ‘विकलांगता-समायोजित जीवन वर्ष’ (DALYs) का नुकसान होता है। यह एक ऐसा मापन उपाय है जिसमें बीमारियों के बोझ के कारण किसी व्यक्ति की समय पूर्व मृत्यु होने से वार्षिक नुक़सान आँका जाता है। यानि अगर उस व्यक्ति को कामकाज या कार्यस्थल पर स्वस्थ माहौल मिलता तो वो व्यक्ति और अधिक वर्षों तक कामकाज कर सकता था जिस दौरान समाज व देश को लाभ होता। दूसरे शब्दों में स्वस्थ कामकाजी जीवन के वर्ष।

मनोसामाजिक जोखिम कारकों से जुड़े हृदय रोग और मानसिक विकारों के कारण, हर साल वैश्विक सकल घरेलू उत्पाद (GDP) के 1.37 प्रतिशत के बराबर नुक़सान होता है जोकि एक बहुत विशाल आँकड़ा है।

श्रमिकों की 35 प्रतिशत संख्या, हर सप्ताह 48 घंटे से अधिक काम करते हैं (काम के लम्बे घंटे एक गम्भीर मनोवैज्ञानिक जोखिम के कारक हैं)।

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