मध्य हिमालय में हैंगिंग ग्लेशियर से होने वाले खतरों पर नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल का नोटिस

हाल ही में हुई एक स्टडी में चेतावनी दी गई है कि खड़ी पहाड़ी ढलानों पर मौजूद अस्थिर हैंगिंग ग्लेशियर आपदाओं का कारण बन सकते हैं। मध्य हिमालय में हैंगिंग ग्लेशियर से होने वाले खतरों पर स्वतः संज्ञान लेते हुए नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल ने केंद्रीय पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय सहित केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB), नेशनल मिशन फॉर क्लीन गंगा और दूसरे संबंधित स्टेकहोल्डर्स को इस बारे में अपना जवाब देने के लिए नोटिस जारी किया है।

नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल ने बड़े पर्यावरण संबंधी मुद्दों और पर्यावरण (संरक्षण) एक्ट, 1986 के संभावित उल्लंघन को देखते हुए कहा है कि यह मामला पर्यावरण सुरक्षा और कानूनी जरूरतों के पालन के बारे में जरूरी सवाल उठाता है।

बताते चलें कि मध्य हिमालय में पहाड़ी ढलानों पर हैंगिंग ग्लेशियर से होने वाले खतरों पर एनजीटी की प्रिंसिपल बेंच ने ‘स्टडी फ्लैग्स ने नजरअंदाज किया’ टाइटल वाली एक खबर पर ध्यान देते हुए यह निर्देश जारी किया है। मामले की सुनवाई के दौरान बीते दिन यानी शुक्रवार को एनजीटी की ओर से कहा गया कि खबर सेंट्रल हिमालय में पहाड़ी ढलानों पर हैंगिंग ग्लेशियर से होने वाले खतरे से जुड़ी है। इस बेंच में अध्यक्ष जस्टिस प्रकाश श्रीवास्तव और एक्सपर्ट मेंबर डॉक्टर अफरोज अहमद शामिल हैं।

एक वैज्ञानिक अध्ययन का जिक्र करते हुए शोधकर्ताओं द्वारा चेतावनी दी गई है कि उत्तराखंड के अलकनंदा बेसिन में अस्थिर हैंगिंग ग्लेशियर एवलांच और नीचे की तरफ आपदाओं को बढ़ावा दे सकते हैं। इस स्टडी में जिन खतरों की और इशारा किया गया है उनमे ग्लेशियर के पीछे हटने के साथ भूकंप की संवेदनशीलता और बद्रीनाथ, माना और हनुमान चट्टी जैसे कमजोर ऊंचाई वाले इलाकों में इंसानी बस्तियों और आधारभूत संरचनाओं के तेजी से बढ़ने से बढ़ते खतरों का ज़िक्र है। गौरतलब है कि इन शोधकर्ताओं की टीम में इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ़ साइंस, बेंगलुरु, आईआईटी भुवनेश्वर और डीआरडीओ जैसे बड़े संस्थानों जानकारों ने शिरकत की।

सुप्रीम कोर्ट की ओर से मानी गई अपनी स्वतः संज्ञान अधिकार का इस्तेमाल करते हुए, ट्रिब्यूनल ने कई अधिकारों को प्रतिवादी के तौर पर शामिल किया है। इनमें पर्यावरण मंत्रालय के अलावा वन और जलवायु परिवर्तन, सीपीसीबी, उत्तराखंड टूरिज्म डेवलपमेंट बोर्ड, एनएमसीजी, शहरी विकास विभाग, उत्तराखंड, और नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ हाइड्रोलॉजी, रुड़की शामिल हैं।

6 अगस्त को इस मामले पर एक संबंधित मामले के साथ आगे विचार किया जाएगा। बताते चलें कि ट्रिब्यूनल ने सभी प्रतिवादियों को नोटिस भेजने के साथ अगली सुनवाई से पहले उन्हें एफिडेविट के रूप में अपने जवाब जमा करने का निर्देश दिया है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *