16 साल के मयंक चक्रवर्ती ने शतरंज में इतिहास रचते हुए भारत के 94वें और पूर्वोत्तर के पहले ग्रैंडमास्टर बनने का गौरव हासिल कर लिया है। उन्होंने स्वीडिश आईएम फिलिप लिंडग्रेन को हराकर यह उपलब्धि हासिल की।

स्वीडन में इंटरनेशनल मास्टर मयंक चक्रवर्ती ने बीते दिन स्वीडन के होटल स्टॉकहोम नॉर्थ में 8वें जीएम टूर्नामेंट में ऑफिशियली अपना फाइनल ग्रैंडमास्टर क्राइटेरिया हासिल कर लिया। इसके साथ ही असम को अपना पहला चेस ग्रैंडमास्टर मिल गया है।
मयंक ने शानदार परफॉर्मेंस के साथ फील्ड में अपना दबदबा बनाया, 9 में से 7 पॉइंट्स के साथ पहले स्थान पर रहे। टॉप सीड को हराकर और फाइनल राउंड में अपनी लगातार जीत बनाए रखते हुए, उन्होंने ग्रैंडमास्टर बनने के लिए जरूरी 2500 FIDE रेटिंग बैरियर भी पार कर लिया।
असम के गुवाहाटी के रहने वाले मयंक चक्रवर्ती 2024 में इंटरनेशनल मास्टर बने थे। उन्होंने ’होटल स्टॉकहोम नॉर्थ बाय फर्स्ट होटल्स चेस टैलेंट्स टूर्नामेंट’ के आठवें दौर में एक दौर बाकी रहते ही यह उपलब्धि हासिल कर ली। उन्होंने इस दौर में स्वीडिश आईएम फिलिप लिंडग्रेन को हराया। मयंक ने दो बार अंडर-17 नेशनल टाइटल जीता, और जब उसने पहली बार यह टाइटल जीता था, तब वह सिर्फ़ 12 साल का था। 2023 में, वह इंटरनेशनल मास्टर बन गया।
जब मयंक चक्रवर्ती छह साल के थे, तो उनकी माँ डॉ. मोनोमिता, के एक सहकर्मीने उन्हें सुझाव दिया था कि तुम्हारे बेटे का दिमाग बहुत तेज़ है और इसे शतरंज खेलने के लिए कहो।
मोनोमिता ने उनका दाखिला एक एनजीओ द्वारा चलाए जा रहे शतरंज क्लब की कक्षाओं में करवा दिया। छह साल की उम्र में उन्होंने जो पहला टूर्नामेंट खेला, वह कुछ खास नहीं रहा। इसके कुछ ही समय बाद, मयंक ने ऐलान कर दिया कि अब वह शतरंज नहीं खेलेंगे और इसके बजाय बैडमिंटन खेलना चाहते हैं।
यह लगभग वही समय था जब पीवी संधू ने 2016 के ओलंपिक में रजत पदक जीतकर भारतीय बैडमिंटन को एक नई ऊँचाई पर पहुँचाया था। मोनोमिता और उनके पति, केशव, बारी-बारी से मयंक को सुबह-सुबह पास की एक अकादमी में ट्रेनिंग के लिए ले जाते थे। वह वहाँ से नाखुश लौटते थे, क्योंकि उनसे मैदान के चक्कर लगाने को कहा जाता था, जबकि उनका एकदम नया रैकेट बिना इस्तेमाल हुए ही पड़ा रहता था।
मीडिया से मोनोमिता ने बताया कि मयंक थोड़ा गोल-मटोल बच्चा था, इसलिए कोच को लगा कि उसे पहले शारीरिक रूप से फिट होने की ज़रूरत है। ऐसे में फिटनेस के लिए लगाए जाने वाले चक्करों और दीवार पर शटल मारने से ऊबकर, मयंक ने तय कर लिया कि बैडमिंटन उनके लिए नहीं है, और इस तरह शतरंज एक बार फिर उनकी ज़िंदगी में लौट आया। इस बार, बात कुछ अलग थी।
इस अचीवमेंट के साथ, मयंक असम और नॉर्थ ईस्ट से पहले ग्रैंडमास्टर बन गए। सिलचर और पूरे राज्य में स्पोर्ट्स कम्युनिटी में जश्न का माहौल है। इस माइलस्टोन को इस इलाके में चेस के लिए एक बड़े बूस्ट के तौर पर देखा जा रहा है, जो यह साबित करता है कि डेडिकेशन के साथ, दुनिया के टॉप खिलाड़ी पहुंच में हैं।












