यूजीसी के नए नियमों को लेकर विरोध बढ़ता जा रहा है। सूबे की राजधानी लखनऊ में यूजीसी के नए नियमों के विरोध के चलते भाजपा के 11 पदाधिकारियों ने एक साथ पार्टी छोड़ी है। इन अधिकारीयों का यह भी कहना है कि पार्टी उद्देश्य से भटक गई है।

यूजीसी के नए नियमों के विरोध में लखनऊ में एक साथ 11 भाजपा पदाधिकारियों के पार्टी छोड़ने को लेकर अब सियासी गलियारों में चर्चा ने भी रफ़्तार पकड़ ली है। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, यूजीसी के नए नियमों के विरोध में लखनऊ में भारतीय जनता पार्टी के 11 पदाधिकारियों ने एक साथ इस्तीफा देने वाले पदाधिकारियों का कहना है कि वह अब पार्टी के किसी भी कार्यक्रम में सम्मिलित नहीं होंगे।
ख़बरों के अनुसार, पार्टी से इस्तीफा देने वाले अंकित तिवारीका कहना है कि हमारे प्रेरणा स्त्रोत पंडित दीन दयाल उपाध्याय और श्यामा प्रसाद मुखर्जी द्वारा जिस उद्देश्य से पार्टी का निर्माण किया गया था, पार्टी उस उद्देश्य से भटक रही है। उनका मानना है कि पार्टी के श्रेष्ठ पदाधिकारियों द्वारा यूजीसी कानून लागू करके हमारे बच्चों के भविष्य के साथ खिलवाड़ किया जा रहा है।
भाजपा से किनारा करने वाले पार्टी के इन पूर्व पदाधिकारियों ने यह आरोप लगाया है कि जिस उद्देश्य से पार्टी का निर्माण किया गया था, पार्टी उस उद्देश्य से भटक गई है। जानकारी के मुताबिक़, पार्टी छोड़ने वाले पदाधिकारी बख्शी तालाब के कुम्हारवां मंडल महामंत्री अंकित तिवारी का कहना है कि यह कानून लागू करके हमारे सवर्ण समाज के बच्चों के भविष्य के साथ खिलवाड़ किया जा रहा है। नारजगी व्यक्त करते हुए उन्होंने अपने समस्त पदों से इस्तीफा देने की बात भी कही है।
मंडल उपाध्यक्ष आलोक सिंह, मंडल मंत्री महावीर सिंह, शक्ति केंद्र संयोजक मोहित मिश्रा, शक्ति केंद्र संयोक वेद प्रकाश सिंह, शक्ति केंद्र संयोजक नीरज पांडेय, युवा मोर्चा मंडल अध्यक्ष अनूप सिंह, युवा मोर्चा मंडल महामंत्री राज विक्रम सिंह, पूर्व मंडल मंत्री अभिषेक अवस्थी, बूथ अध्यक्ष विवेक सिंह और पूर्व सेक्टर संयोजक कमल सिंह ने भी यूजीसी के विरोध में इस्तीफा देने की बात स्वीकार की है।
गौरतलब है कि सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के बाद विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) ने उच्च शिक्षण संस्थानों में समानता को बढ़ावा देने संबंधी विनियम, 2026 जारी किए हैं। यूजीसी के नए नियमों के अनुसार, प्रत्येक उच्च शिक्षण संस्थान को एक समान अवसर केंद्र स्थापित करना होगा और उसे नागरिक समाज समूहों, जिला प्रशासन, संकाय सदस्यों, कर्मचारियों, स्थानीय मीडिया और पुलिस के साथ समन्वय स्थापित करना होगा।
नियम में यह भी कहा गया है कि यह केंद्र कानूनी सहायता की सुविधा प्रदान करने के लिए जिला और राज्य विधि सेवा प्राधिकरणों के साथ समन्वय स्थापित करेगा। अनुसूचित जाति (एससी), अनुसूचित जनजाति (एसटी) के साथ-साथ अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) को भी जातिगत भेदभाव की परिभाषा में शामिल किया गया है। इसी बात पर अगड़ा समाज में नाराज़गी है। सोशल मीडिया पर इसे लेकर बहस तेज हो गई है।













