वैश्विक स्तर पर एक ओर जहाँ मृत्युदंड पर पाबन्दी लगाने की दिशा में काम किया जा रहा है वहीँ 2025 में इन प्रयासों को एक बड़ा झटका लगा है। यूएन मानवाधिकार कार्यालय द्वारा साझा की गई जानकारी बताती है कि ईरान में पिछले वर्ष, कम से कम 1,500 लोगों को मौत की सज़ा दी गई। इनमें लगभग 47 प्रतिशत मामले मादक पदार्थ (ड्रग्स) सम्बन्धी अपराधों से जुड़े थे।

संयुक्त राज्य अमरीका में 47 लोगों को मृत्युदंड दिया गया, जोकि पिछले 16 वर्षों में सबसे अधिक संख्या है। इसी बीच सऊदी अरब में बीते वर्ष कम से कम 356 लोगों को मौत की सज़ा दी गई है, जोकि 2024 की तुलना में अधिक है। इनमें 78 प्रतिशत मामले ड्रग-सम्बन्धी अपराधों के हैं। बताते चलें कि सऊदी अरब में 2022 के बाद मृत्युदंड को फिर से शुरू किया गया था।
OHCHR के अनुसार, अक्सर बच्चों द्वारा अंजाम दिए अपराधों में भी उन्हें मृत्युदंड दिया जा रहा है, और इन सज़ाओं के मामलों में निरन्तर गोपनीयता बरती जाती है। उच्चायुक्त टर्क के अनुसार, मृत्युदंड के इस्तेमाल में चिन्ताजनक वृद्धि की निगरानी दर्शाती है कि यह सज़ा उन मामलों में भी सुनाई जा रही है, जोकि अन्तरराष्ट्रीय क़ानून के तहत, सबसे गम्भीर अपराधों की श्रेणी में नहीं आते हैं।
यूएन मानवाधिकार उच्चायुक्त कार्यालय (OHCHR) ने आगाह किया है कि पिछले वर्ष, मौत की सज़ा के मामलों में उछाल दर्ज किया गया और यह वृद्धि उन गिने-चुने देशों में ये सज़ाएँ दिए जाने की वजह से है, जहाँ अब भी मृत्युदंड पर रोक नहीं है।
यूएन कार्यालय ने बताया कि सऊदी अरब में मृत्युदंड के कम से कम दो मामलों में अपराध बच्चों के रूप में किए गए थे, जिससे बाल अधिकारों के प्रति सम्मान पर भी गम्भीर प्रश्न खड़े होते हैं। रिपोर्ट में कहा गया है कि मृत्युदंड मामलों में यह उछाल विशेष रूप से उन ड्रग-सम्बन्धी अपराधों की वजह से है, जिनमें इरादतन हत्या नहीं की गई हो।
वोल्कर टर्क ने कहा कि यह न केवल अन्तरराष्ट्रीय क़ानून के विपरीत है, बल्कि अपराध रोकने में भी बेअसर है। उनका कहना है कि मौत की सज़ा दिए जाने का स्तर व गति बताती है कि सर्वोच्च दंड का व्यवस्थागत ढंग से इस्तेमाल, राज्यसत्ता द्वारा डराए जाने के औज़ार के रूप में किया जा रहा है, जिसका ग़ैर-आनुपातिक ढंग से जातीय अल्पसंख्यकों व प्रवासियों पर असर हो रहा है।
संयुक्त राज्य अमरीका में मृत्युदंड, गैस के ज़रिए दम घोंट कर दिया जाता है, जिसकी शुरुआत 2024 में की गई थी। अब इसका इस्तेमाल बढ़ने से यातना व क्रूर दंड पर भी चिन्ता है।
इन सबके बीच अफ़ग़ानिस्तान में सार्वजनिक रूप से मृत्युदंड दिए जाने के मामले जारी हैं, जोकि अन्तरराष्ट्रीय क़ानून का उल्लंघन हैं। सोमालिया में करीब 24 और सिंगापुर में 17 व्यक्तियों को पिछले वर्ष मृत्युदंड दिया गया। चीन और कोरिया लोकतांत्रिक जन गणराज्य (उत्तर कोरिया) में मौत की सज़ा के मामले गोपनीयता में घिरे हैं और वास्तविक संख्या की पुष्टि कर पाना कठिन है।
इसराइल में, सिलसिलेवार ढंग से क़ानून के प्रस्ताव पेश किए गए हैं, जिन्हें स्वीकृति मिलने पर कुछ अपराधों के तहत केवल फ़लस्तीनियों को अनिवार्य ढंग से मृत्युदंड दिया जाएगा। इससे निष्पक्ष न्याय प्रक्रिया, अन्तरराष्ट्रीय मानवाधिकार और मानवतावदी क़ानून के उल्लंघन की चिन्ता उपजती है। ग़ाज़ा पट्टी में हमास द्वारा लोगों को जान से मार दिए जाने के मामले भी मानवाधिकारों का खुला उल्लंघन हैं।
सकारात्मक प्रगति
अनेक देशों ने वर्ष 2025 में उत्साहजनक ढंग से क़दम बढ़ाए हैं. वियतनाम में कई अपराधों के लिए मृत्युदंड को समाप्त कर दिया गया है.पाकिस्तान में भी दो ग़ैर-घातक अपराधों में इसे वापिस लिया गया है, हालांकि 29 अपराध मामलों में यह अब भी लागू है।
ज़िम्बाब्वे ने 31 दिसम्बर 2024 को आम अपराधों के लिए मृत्युदंड का उन्मूलन कर दिया गया था. वहीं, केनया में मृत्युदंड की क़ानूनी समीक्षा की शुरुआत की गई है।
मलेशिया ने सज़ा पर पुनर्विचार के प्रावधान से, मृत्युदंड का जोखिम झेल रहे लोगों की संख्या में एक हज़ार की कमी आई है। वहीं, किर्गिज़स्तान में संवैधानिक अदालत ने मृत्युदंड पर फिर से पाबन्दी की पुष्टि करते हुए कहा कि मौत की सज़ा के प्रावधान पर केन्द्रित विधेयक अंसवैधानिक है।
मानवाधिकार उच्चायुक्त वोल्कर टर्क ने आग्रह किया है कि जिन देशों में मृत्युदंड का प्रावधान है, उन्हें यह दंड दिए जाने के मामलों पर स्वैच्छिक रूप से रोक लगानी होगी, मौत की सज़ा के मामलों को आम माफ़ी दी जानी होगी और इसके पूर्ण उन्मूलन की दिशा में क़दम बढ़ाने होंगे।














