लखनऊ के मशहूर टुंडे कबाबी बंद नहीं हो पा रही मीट की सप्लाई

लखनऊ : यूपी में बूचड़खानों पर कार्रवाई का असर लखनऊ के मशहूर टुंडे कबाबों पर भी पड़ा है. 100 साल के इतिहास में पहली बार ऐसा हुआ जब ‘टुंडे कबाबी’ दुकान बंद रही. tunday kababi

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बुधवार को दुकान नहीं खुली. गुरुवार को खुली तो बस मीट और चिकन के कबाब मिल रहे थे.

टुंडे कबाब लखनऊ की शान और शोहरत का हिस्सा हैं.

कहते हैं कि इनसे बेहतर कबाब भले मिल जाएं, लेकिन ऐसे कबाब नहीं मिलेंगे, लेकिन बुधवार को ये कबाब भी नहीं मिले.

वहीं भैंसे के गोश्त के कबाब गुरुवार को भी नहीं मिले.

इन्हें गोश्त देने वाले अब सप्लाई नहीं कर पा रहे. नई सरकार के आने के बाद यूपी में अवैध बूचड़खानों पर कार्रवाई चल रही है. जाहिर है कि इसकी जद में बहुत सारे वे लोग भी आ रहे हैं, जिनका कारोबार जायज़ है.

आम दिनों में इस दुकान पर दोपहर 1 बजे का समय सबसे ज्यादा व्यस्त होता है. लखनऊ के भीड़ भरे इस चौक में देश ही नहीं विदेशों से भी लोग आते हैं. लेकिन आज इसके 20 में से 15 टेबल खाली थे. दुकान की हर दीवार पर अब नए स्टिकर चिपका दिए गए हैं. जहां लिखा है मटन और चिकन कबाब.

लखनऊ की सबसे पुरानी दुकानों में से एक टुंडे कबाब में भैंस के मांस से बने कबाब बेचे जा रहे हैं, जब से यह शुरू हुई है. टुंडे कबाबी के मैनेजर अबु बकर ने बताया कि लोग यहां भैंस के मांस से बने कबाब खाने आते हैं. मुझे यह पक्का नहीं है कि लोग यहां मटन और चिकन के कबाब भी उतने ही उत्साह से लेंगे.

गौरतलब है कि जो भैंस का मांस उपलब्ध कराते थे उन बूचड़खानों को बुधवार को प्रशासन ने कागजात सही न कहकर बंद कर दिया है. दरअसल, योगी आदित्यनाथ के सीएम बनने के बाद बिना लाइसेंस के काम करने वाले बूचड़खानों को बंद कर दिया गया है.

योगी आदित्यनाथ ने चुनावों में वादा किया था कि अवैध बूचड़खानों को बंद कर दिया जाएगा. टुंडे कबाबी में बूचड़खानों से आए हर रोज 25 किलो भैंस के मांस इस्तेमाल होता था. कर्फ्यू या प्राकृतिक आपदा को छोड़ पहली बार बुधवार को टुंडे कबाबी की दुकान बंद रही. अबु बकर ने बताया कि आम दिनों में आप आते तो मेरे पास आपसे बात करने का समय भी नहीं होता.

सरकार जो भी निर्णय लेगी मैं उसके साथ चलूंगा लेकिन हर किसी को अनियमितताओं को पूरा करने के लिए कुछ समय दिया जाना चाहिए अन्यथा मेरा बिजनेस खत्म हो जाएगा और कई लोग अपनी नौकरी गंवा बैठेंगे.

यहां अक्सर आने वाले बिजनेसमैन मोहम्मद जावेद को बुधवार को लौटना पड़ा. उन्होंने कहा कि भैंस के मांस से बने कबाब सस्ते भी होते हैं. आर्थिक रूप से कमजोर लोग यहां 30 रुपये में कबाब खा सकते हैं.

हर कोई 50 से 70 रुपये के चिकन और मटन के कबाब नहीं खरीद सकता. मैं सरकार के साथ हूं लेकिन वैध व्यवसायों को नुकसान नहीं पहुंचाया जाना चाहिए.

जब हम दुकान से निकल रहे थे तो अबु बकर फोन पर एक पुराने कस्टमर को कह रहे थे कि आप आइये हम चिकन और मटन कबाब से दोबारा खोलेंगे. मैं वही स्वाद देने की कोशिश करूंगा.

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