दुनिया अब जल संकट की अवस्था से आगे बढ़कर ‘वैश्विक जल दिवालिएपन’ की स्थिति में दाखिल हो चुकी है। मंगलवार को संयुक्त राष्ट्र शोधकर्ताओं द्वारा जारी एक अहम रिपोर्ट में यह चेतावनी जारी की गई है। इसका कारण बीते कई दशकों के दौरान होने वाला भूजल स्रोतों का अत्यधिक दोहन, भूमि क्षरण, बढ़ते प्रदूषण और जलवायु परिवर्तन से उपजी बाधाएं हैं।

यूनाइटेड नेशन की ये रिपोर्ट बताती है कि वैज्ञानिक, नीति-निर्माता और मीडिया एक “वैश्विक जल संकट” के प्रति लम्बे समय से आगाह करते आ रहे हैं, जिसे एक अस्थाई झटके के रूप में देखा जाता था, मगर एक ऐसा व्यवधान जिसके बाद हालात के सामान्य होने की उम्मीद की जाती थी। इस बीच संयुक्त राष्ट्र विश्वविद्यालय के जल, पर्यावरण और स्वास्थ्य संस्थान ने जल उपलब्धता के मामले में अति गम्भीर संकट की स्थिति पर अपनी नई रिपोर्ट जारी की है, जो इस उम्मीद पर पानी फेर रही है।
रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है कि दुनिया की जल आपूर्ति प्रणाली अब पतन के दौर में, दिवालिएपन की स्थिति में प्रवेश कर चुकी है। दुनिया के अनेक हिस्सों में जल की स्थाई कमी है, जहाँ जल प्रणालियाँ अपने पुराने, ऐतिहासिक स्तर पर लौटने में सक्षम नहीं रह गई हैं।
संयुक्त राष्ट्र विश्वविद्यालय के जल, पर्यावरण और स्वास्थ्य संस्थान के निदेशक कावेह मदानी ने न्यूयॉर्क मुख्यालय में पत्रकारों को जानकारी देते हुए कहा, “दुनिया के बड़े हिस्से के लिए अब ‘सामान्य स्थिति’ ख़त्म हो चुकी है।”
आगे वह कहते हैं कि इस रिपोर्ट का मक़सद उम्मीद को ख़त्म करना नहीं, बल्कि कार्रवाई के लिए प्रेरित करना और आज की विफलताओं को ईमानदारी से स्वीकार करना है, ताकि कल को सुरक्षित और बेहतर बनाया जा सके।
असमान बोझ
निदेशक कावेह मदानी ने ज़ोर देकर कहा कि इस रिपोर्ट का अर्थ यह नहीं है कि पूरी दुनिया की जल व्यवस्था विफल हो चुकी है। मगर, ऐसे अनेक देश और क्षेत्र हैं, जहाँ जल प्रणालियाँ या तो पूरी तरह चरमरा चुकी हैं (पूर्ण रूप से जल दिवालियापन) या विफलता के कगार (जल दिवालियापन के क़रीब) पर हैं।
उन्होंने बताया कि इस संकट का सबसे अधिक बोझ छोटे किसानों, आदिवासी समुदायों, कम आय वाले शहरी निवासियों, महिलाओं और युवाओं पर पड़ रहा है, जबकि जल के अत्यधिक दोहन से मिलने वाले लाभ अक्सर अधिक शक्तिशाली वर्गों तक ही सीमित रहे हैं।
संकट से उबरने की राह
रिपोर्ट में ‘जल दिवालियापन’ की अवधारणा पेश की गई है, जिसे दो स्थितियों से परिभाषित किया गया है: जल की कमी को पूरा कर पाने में असमर्थता और उसे ठीक कर पाने में अत्यधिक कठिनाई।
इस असमर्थता का अर्थ है कि नवीकरणीय जल की उपलब्धता और उसकी सुरक्षित सीमा से कहीं अधिक मात्रा में पानी का उपयोग और उसे प्रदूषित किया जाना। वहीं, अपरिवर्तनीयता से तात्पर्य, आर्द्रभूमि या झीलों जैसे जल-आधारित प्राकृतिक संसाधनों को पहुँचने वाले नुक़सान से है, जिसकी वजह से जल प्रणाली को उसकी मूल स्थिति में लौटाना सम्भव नहीं रह जाता है।
इसके बावजूद रिपोर्ट में स्पष्ट किया गया है कि स्थिति पूरी तरह निराशाजनक नहीं है। कावेह मदानी ने वित्तीय संकट की तुलना करते हुए कहा कि दिवालियापन, किसी कार्रवाई का अन्त नहीं, बल्कि सुधार की एक व्यवस्थित प्रक्रिया की शुरुआत होता है। आगे उन्होंने कहा, “इसका अर्थ है पहले नुक़सान को रोकना, आवश्यक सेवाओं की रक्षा करना और फिर प्रणाली के पुनर्निर्माण में निवेश करना।”













