सुप्रीम कोर्ट ने सोनाली नाम की महिला और उसके परिवार के पांच सदस्यों को भारत लौटने की इजाज़त दे दी है। इंसानियत के आधार पर कोर्ट ने केंद्र सरकार से नौ महीने की प्रेग्नेंट सोनाली और उसके आठ साल के बच्चे के पक्ष में यह फैसला किया।

27 जून को सोनाली नाम की इस महिला और उसके परिवार के पांच सदस्यों को बांग्लादेशी होने के शक में बांग्लादेश डिपोर्ट कर दिया गया था। मामले की सुनवाई के दौरान चीफ जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जयमालिया बागची ने कहा कि कभी-कभी इंसानियत के आगे कानून को झुकना पड़ता है। कोर्ट इस मामले में आगे की कार्यवाही 10 दिसंबर को करेगा, जिसमें परिवार के अन्य सदस्यों की वापसी पर सुनवाई होगी।
इस फैसले के बाद सोनाली महिला और उसके बच्चे को इंसानियत के आधार पर भारत लाया जाएगा। यह कदम बिना किसी भेदभाव के उठाया गया है। केंद्र सरकार ने यह भी साफ कर दिया है कि इससे दूसरे मामले प्रभावित नहीं होंगे। यह पूरी तरह इंसानियत के आधार पर उठाया गया कदम है।
सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को दिए गए इस फैसले में पश्चिम बंगाल सरकार से नाबालिग का ध्यान रखने को भी कहा और बीरभूम जिले के चीफ मेडिकल ऑफिसर को प्रेग्नेंट महिला सोनाली खातून को हर मुमकिन मेडिकल मदद देने का निर्देश दिया।
बेंच ने सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार की तरफ से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता के इस बयान पर गौर किया कि सक्षम अथॉरिटी ने महिला और उसके बच्चे को सिर्फ मानवीय आधार पर देश में आने की इजाज़त देने पर सहमति जताई है और उन्हें निगरानी में रखा जाएगा। उन्हें आखिर में दिल्ली वापस लाया जाएगा, जहां से उन्हें बांग्लादेश भेजा जाएगा।
सीनियर वकील कपिल सिब्बल और संजय हेगड़े ने कोर्ट को जानकारी दी है कि सोनाली के पति और परिवार के दूसरे सदस्य भी बांग्लादेश में हैं और उन्हें भारत वापस लाने की ज़रूरत है, जिसके लिए मेहता आगे के निर्देश मांग सकते हैं। मेहता ने कहा कि वह उनके भारतीय नागरिक होने के दावे का विरोध करेंगे, यह कहते हुए कि वह एक बांग्लादेशी नागरिक हैं और केंद्र सरकार सिर्फ मानवीय आधार पर महिला और उसके बच्चे को भारत में आने की इजाज़त दे रही है।












