सुप्रीम कोर्ट ने आवारा कुत्तों के मामले में बदलाव या उसे रद्द करने की मांग वाली सभी याचिकाओं और एप्लीकेशन को खारिज कर दिया है। इस मामले में अदालत ने अपने पुराने आदेश को बदलने से इनकार कर दिया है।
शीर्ष अदालत ने यह भी कहा कि गंभीर रूप से बीमार कुत्तों को मारने पर भी विचार किया जा सकता है। साथ ही अदालत ने राज्य सरकारों को कई अहम निर्देश भी दिए हैं। कोर्ट ने सख्त टिप्पणी की कि राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों ने आवारा कुत्तों की बढ़ती आबादी से निपटने के लिए ज़रूरी इंफ्रास्ट्रक्चर बनाने के लिए लगातार कोशिशें नहीं की हैं।
अपना फैसला सुनाते हुए, कोर्ट ने कहा कि वह देश के अलग-अलग हिस्सों से बच्चों और बुज़ुर्गों पर हमलों की खबरों को नज़रअंदाज़ नहीं कर सकता। कोर्ट ने कहा कि आम नागरिक सार्वजनिक जगहों पर असुरक्षित रहते हैं और इंटरनेशनल ट्रैवलर भी ऐसी घटनाओं का शिकार हुए हैं।
कोर्ट ने आवारा जानवरों के संबंध में एनिमल वेलफेयर बोर्ड ऑफ इंडिया द्वारा जारी स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर की वैलिडिटी को चुनौती देने वाली सभी याचिकाओं को खारिज कर दिया।
गौरतलब है कि जस्टिस विक्रम नाथ, संदीप मेहता और एनवी अंजारिया की बेंच ने इस मामले की सुनवाई की। कई याचिकाओं पर लंबी सुनवाई के बाद, बेंच ने 29 जनवरी को अपना फैसला सुरक्षित रख लिया था।
अपनी याचिका में तर्क देने वाले पशु प्रेमियों का कहना था कि आवारा कुत्तों को सार्वजनिक स्थानों से हटाने का आदेश बहुत कठोर है और इससे कुत्तों के अधिकारों का हनन हो रहा है। उन्होंने पशु जन्म नियंत्रण कार्यक्रम को और प्रभावी बनाने पर जोर दिया था। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने इन दलीलों को खारिज करते हुए जनहित और सार्वजनिक सुरक्षा को प्राथमिकता दी।
एक अहम आदेश देते हुए सुप्रीम कोर्ट द्वारा उन कुत्तों को मारने के निर्देश दिए गए हैं जो रेबीज और गंभीर रूप से बीमार होने के कारण इंसानी जीवन के लिए खतरनाक हैं। अदालत का कहना है कि वह जमीनी हकीकत से आंखें नहीं मूंद सकती, जहां बच्चे, यात्री और बुजुर्ग लगातार डॉग बाइट की घटनाओं के शिकार हो रहे हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने सभी राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों को निर्देश देते हुए कहा है कि वे आवारा कुत्तों की बढ़ती संख्या से निपटने के लिए मिलजुलकर प्रयास करते हुए जरूरी बुनियादी ढांचे को मजबूत करें।