देश के प्रख्यात समालोचक वीरेंद्र यादव का आज सुबह हृदय गति रुकने से निधन हो गया। कथा आलोचना में लगातार सक्रिय रहे वीरेंद्र यादव की उम्र 76 वर्ष थी। वे लंबे समय से प्रगतिशील लेखक संघ से जुड़े थे।

वीरेंद्र यादव का जन्म 5 मार्च 1950 को उत्तर प्रदेश के जौनपुर जनपद में हुआ था। उन्होंने लखनऊ विश्वविद्यालय से राजनीतिशास्त्र में एमए किया था। उन्होंने एलआईसी में नौकरी करते हुए भी प्रगतिशील लेखक संघ में अपनी सक्रियता बनाए रखी थी और आजीवन प्रगतिशील लेखक संघ से जुड़े रहे। उन्होंने छात्र जीवन से ही वामपंथी बौद्धिक व सांस्कृतिक गतिविधियों में हिस्सा लेना शुरू कर दिया था और लेखन तथा आलोचना के क्षेत्र में अंत तक सक्रिय रहे।
किंडल एडिशन के समर्थक वीरेंद्र यादव का मानना है कि ये समय और परिवर्तन की मांग है जिसे रोका नहीं जा सकता। किंडल एडिशन प्रिंट मीडिया के समानांतर रहकर एक नए पाठक वर्ग को साहित्य से जोड़ रहा है, जिसकी सबसे बड़ी खूबी राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर मुहैया होना है।
‘उपन्यास और वर्चस्व की सत्ता’ उनकी पहली चर्चित पुस्तक है। ‘तद्भव’ पत्रिका में प्रकाशित एक लेख के लिए उन्हें देवीशंकर अवस्थी सम्मान प्रदान किया गया था। उन्होंने कुछ समय तक ‘प्रयोजन’ पत्रिका का संपादन भी किया था। उत्तर प्रदेश प्रगतिशील लेखक संघ के लम्बे समय तक सचिव एवं ‘प्रयोजन’ पत्रिका के सम्पादक रहे।
वीरेंद्र यादव अपनी जनपक्षधरता के लिए जाने जाते थे। आलोचना की दुनिया में वीरेंद्र यादव ने अपना महत्वपूर्ण स्थान बनाया था। उन्हें उपन्यास विधा के श्रेष्ठ आलोचक के रूप में प्रसिद्धि मिली।
वीरेन्द्र यादव ने जान हर्सी की पुस्तक ‘हिरोशिमा’ का अंग्रेज़ी से हिन्दी में अनुवाद किया। साहित्यिक-सांस्कृतिक विषयों पर पत्र-पत्रिकाओं में सक्रिय रूप से लेखन करते रहे। प्रेमचन्द से जुड़ी बहसों और ‘1857’ के विमर्श पर हस्तक्षेपकारी लेखन के लिए विशेष रूप से चर्चित। उनके कई लेखों का अंग्रेज़ी और उर्दू में अनुवाद प्रकाशित है।
‘राग दरबारी’ उपन्यास पर केन्द्रित विनिबन्ध इन्दिरा गांधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय, दिल्ली के एम ए पाठ्यक्रम में शामिल हैं। ‘नवें दशक के औपन्यासिक परिदृश्य’ पर निबन्ध ‘पहल पुस्तिका’ में प्रकाशित हुआ है।
लेखन
उपन्यास और वर्चस्व की सत्ता
प्रगतिशीलता के पक्ष में
नवें दशक का औपन्यासिक परिदृश्य और समकालीन हिंदी उपन्यास पर विनिबंध
प्रेमचंद पर हस्तक्षेपकारी लेखन
1857 पर नई इतिहास दृष्टि के साथ लेखन
मार्कण्डेय की संपूर्ण कहानियों और यशपाल के ‘विप्लव’ का संपादन, भूमिका लेखन
‘प्रयोजन’ पत्रिका का संपादन
कई आलोचनात्मक लेखों का अंग्रेजी और उर्दू में अनुवाद व प्रकाशन
पत्र-पत्रिकाओं में समसामयिक मुद्दों पर हस्तक्षेपकारी लेखन
प्रगतिशील लेखक संघ में अग्रणी
सम्मान
देवी शंकर अवस्थी सम्मान, उ. प्र.हिंदी संस्थान का ‘साहित्य भूषण’ सम्मान, गुलाब राय सम्मान और मुद्राराक्षस साहित्य सम्मान।















