हर वर्ष सितंबर महीने के पहले शनिवार को अंतरराष्ट्रीय गिद्ध जागरुकता दिवस मनाया जाता है। इसका उद्देश्य लोगों को इस प्रजाति के अस्तित्व से जागरूक कराना है।

आसमान में मंडराने वाले गिद्ध इस तेजी से विलुप्त हुए कि इनका अस्तित्व ही खतरे में आ गया। गिद्ध को संरक्षण देने वाले इस बात को लेकर चिंतित हैं कि अंतरराष्ट्रीय गिद्ध जागरुकता दिवस के अवसर पर इन प्राकृतिक सफाईकर्मी को कैसे बचाया जाए।
गिद्धों को सबसे बड़ा खतरा पशु चिकित्सा के लिए प्रयोग होने वाली दवा डाइक्लोफेनाक ने पहुँचाया है। भारत में गिद्ध 1990 के दशक के मध्य में विलुप्त होने के कगार पर पहुँच गए थे। इस दवा का उपयोग मवेशियों और बकरियों के उपचार में किया जाता था। इस दवा के खाने के 24 घंटे के भीतर यदि किसी जानवर की मौत हो जाती है तो उसके शव को खाने वाले गिद्धों को आंत संबंधी गठिया हो जाती है जिससे ज़्यादातर गिद्ध की मौत हो जाती है। इससे गिद्धों की संख्या में भारी गिरावट आई।
दुनिया में गिद्धों की 23 प्रजातियां हैं, जबकि भारत में 9 प्रजातियां पाई जाती हैं। हाल की जनगणना के अनुसार, मध्य प्रदेश (भारत का एक राज्य) गिद्धों का सबसे बड़ा गढ़ है, जहाँ 2025 की शुरुआत में गिद्धों की संख्या 12,981 दर्ज की गई थी, जो 2024 में 10,845 थी।
औसतन 20 से 30 साल की आयु वाले गिद्ध की उम्र प्रजातियों और परिस्थितियों पर निर्भर करती है। हालांकि कुछ प्रजातियां 40-45 साल या उससे भी अधिक जीवित रह सकती हैं। उदाहरण के लिए भारतीय गिद्ध 40 से 45 साल तक जीवित रह सकते हैं, जबकि टर्की गिद्ध जंगली में 20 साल तक पहुंच सकते हैं।
हालांकि अब पशु चिकित्सा में डाइक्लोफेनाक के इस्तेमाल पर प्रतिबंध लगा दिया गया है, फिर भी गिद्धों पर गंभीर खतरा मंडरा रहा है। गिद्धों के लिए नए खतरे खतरे की बात करें तो आज तीन प्रमुख चुनौतियों का सामना इस प्रजाति को करना पड़ रहा है-
गांवों में अकसर मवेशियों पर हमला करने वाले आवारा कुत्तों को जहर दिए जाने का चलन। इन जहरीले शवों को खाने वाले गिद्ध भी बड़ी संख्या में जान से जाते हैं।
जैसे-जैसे शहरीकरण बढ़ा है और ऊंचे पेड़ों की कमी हुई है उसी अनुपात में गिद्ध भी बेघर हुए हैं।
गिद्धों की प्रजनन क्षमता कम होती है और यह प्रजाति साल में केवल एक अंडा देती है। ऐसे में इनकी आबादी का सिकुड़ना इनकी संख्या को घटा रहा है।
गिद्धों की कमी से प्रकृति का संतुलन भी बिगड़ा है। अपशिष्ट खाकर यह प्रजाति एक प्राकृतिक प्रबंधक के रूप में सफाई की ज़िम्मेदारी निभाने का काम करती रही है। गिद्ध द्वारा खेतों या सड़कों पर पड़े शवों को साफ कर देने से बीमारियों का प्रसार रुक जाता था। आज, उनकी संख्या में गिरावट ने इस प्राकृतिक व्यवस्था को चरमरा दिया है।
अमेरिकन इकोनॉमिक रिव्यू के एक संस्करण में प्रकाशित अध्ययन से पता चलता है कि गिद्धों की अनुपस्थिति के कारण पाँच वर्षों में प्रति वर्ष लगभग 1,00,000 लोगों की मृत्यु हुई।















