बाढ़ और आकस्मिक बाढ़ की घटनाओं में हर साल हज़ारों लोगों की जान चली जाती हैं और अरबों डॉलर का नुक़सान होता है। हिमालयी क्षेत्रों से लेकर अमरीकी टैक्सस प्रान्त के ग्रामीण इलाक़ों तक जुलाई के महीने में आई भीषण बाढ़ की घटनाओं में सैकड़ों लोगों की जान चली गई। इस दौरान समय-पूर्व चेतावनी प्रणालियों की गम्भीर ख़ामियाँ भी उजागर हुईं।

संयुक्त राष्ट्र की मौसम एजेंसी (WMO) ने आगाह किया है कि इस विनाश का कारण तेज़ी से हो रहा नगरीकरण, भूमि उपयोग में बदलाव व जलवायु परिवर्तन है। जिनसे वातावरण में नमी बढ़ रही है और बाढ़ का ख़तरा भी लगातार गहराता जा रहा है।
विश्व मौसम संगठन का कहना है कि भारी बारिश और हिमनदों के टूटने से जुड़ी बाढ़ की घटनाएँ लगातार बढ़ रही हैं। बिना किसी पूर्व चेतावनी के अचानक आई इन बाढ़ों की चपेट में आए समुदायों के लिए इसके परिणाम बेहद घातक साबित हो रहे हैं। वैज्ञानिकों का मानना है कि यदि वैश्विक तापमान इसी गति से बढ़ता रहा, तो इस सदी के अन्त तक ऐसी बाढ़ की घटनाओं का ख़तरा तीन गुना तक बढ़ सकता है।
2022 में विश्व बैंक के एक अध्ययन में अनुमान लगाया गया कि 1.81 अरब लोग – यानि दुनिया की लगभग एक-चौथाई आबादी -100 में एक बार आने वाली गम्भीर बाढ़ जैसी घटनाओं के सीधे ख़तरे में हैं। इस आबादी में से 89 प्रतिशत लोग, निम्न एवं मध्यम आय वाले देशों में रहते हैं।
विश्व मौसम संगठन के जल विज्ञान, जल और क्रायोस्फीयर निदेशक स्टेफ़ान उहलनब्रुक ने कहा, “आकस्मिक बाढ़ें (flash floods) कोई नई बात नहीं हैं, लेकिन अनियोजित नगरीकरण, भूमि उपयोग में बदलाव और बदलती जलवायु के कारण अब कई क्षेत्रों में बाढ़ों की बारम्बारता और तीव्रता लगातार बढ़ रही है।”
हर अतिरिक्त एक डिग्री सैल्सियस तापमान बढ़ने पर, वायुमंडल लगभग 7 प्रतिशत अधिक जलवाष्प, अपने भीतर संचित कर सकता है। उन्होंने कहा- “इस स्थिति से अत्यधिक वर्षा की घटनाओं का जोखिम बढ़ रहा है। साथ ही गर्म होती जलवायु के कारण तेज़ी से पिघलती बर्फ़ से हिमनद से जुड़ी बाढ़ का ख़तरा भी बढ़ रहा है।”
दक्षिण एशिया के विभिन्न हिस्सों में 2020 में भीषण बाढ़ की घटनाओं में साढ़े 6 हज़ार से अधिक लोगों की मौत हुई और लगभग 105 अरब डॉलर की आर्थिक क्षति दर्ज की गई।
दो साल बाद 2022 में, पाकिस्तान में आई विनाशकारी बाढ़ में 1,700 से अधिक लोगों की मौत हुई, 3.3 करोड़ से ज़्यादा लोग प्रभावित हुए और 40 अरब डॉलर से अधिक का नुक़सान हुआ, जिससे वर्षों की विकास प्रगति पर पानी फिर गया।
इस साल भी जुलाई महीने में ही दक्षिण एशिया, पूर्वी एशिया और संयुक्त राज्य अमरीका में एक के बाद एक, बाढ़ की घातक चरम घटनाएँ देखी गईं।
विश्व मौसम संगठन अब बाढ़ पूर्वानुमान को बेहतर बनाने के लिए अपने वैश्विक प्रयास तेज़ कर रहा है. इसका वास्तविक समय मार्गदर्शन मंच अब 70 से अधिक देशों में उपयोग किया जा रहा है।
यह प्रणाली सैटेलाइट डेटा और रेडार वाले मौसम मॉडल को एकीकृत करती है ताकि सम्भावित ख़तरे का कई घंटे पहले ही पता लगाया जा सके। अब देशों की अगुवाई में वैश्विक रूप से समन्वित एक और तंत्र के रूप में इसका विस्तार किया जा रहा है।
संयुक्त राष्ट्र की सर्वजन के लिए पूर्व चेतावनी (Early Warnings for All) पहल का उद्देश्य है कि 2027 तक दुनिया के हर व्यक्ति को, प्रभावी प्रारम्भिक चेतावनी प्रणाली की सुरक्षा उपलब्ध हो सके।
हालाँकि अमेरिकी राष्ट्रीय मौसम सेवा ने पहले ही चेतावनी जारी कर दी थी, लेकिन स्थानीय सायरन प्रणाली की ओर से ख़ामी रही और अन्तिम चेतावनी तब जारी हुई जब ज़्यादातर लोग गहरी नींद में सो रहे थे।
इस महीने आई सभी बाढ़ें केवल बारिश की वजह से नहीं थीं। 7 जुलाई को नेपाल के रसुवा ज़िले में एक हिमनदी की सतह पर बनी “सुप्राग्लेशियल” झील फटने से अचानक आई बाढ़ में कुछ जलविद्युत संयंत्र, एक प्रमुख पुल और कई व्यापार मार्ग बह गए। इस भीषण घटना में कम से कम 11 लोगों की जान गई, जबकि अनेक लोग अब भी लापता हैं।
विश्व मौसम संगठन (WMO) के साझीदार, एकीकृत पहाड़ी विकास के लिए अन्तरराष्ट्रीय केन्द्र (ICIMOD) के वैज्ञानिकों का कहना है कि हिंदूकुश-हिमालय क्षेत्र में हिमनदी-स्रोत वाली बाढ़ें अब पहले की तुलना में कहीं अधिक बार देखने को मिल रही हैं – जबकि दो दशक पहले ऐसी बाढ़ें आमतौर पर हर पाँच से दस साल में एक बार आती थीं।













