बसपा सुप्रीमों अपने खिसकते जनाधार को बचाने की फिराक में

लोकसभा चुनाव 2024 में बसपा सुप्रीमो मायावती ने अकेले मुक़ाबला करने का फैसला लिया है। उनके इस एलान ने उत्तर प्रदेश की सियासत में हलचल मचा दी है। पार्टियों के गुना गणित एक बार फिर से तेज़ी से होने लगे हैं।

बसपा सुप्रीमों अपने खिसकते जनाधार को बचाने की फिराक में

2019 के लोकसभा चुनाव से पहले भी मायावती ने अकेले ही लड़ने का एलान किया था मगर बाद में सभी को हैरान करते हुए हुए उन्होंने अपने विरोधी, समाजवादी पार्टी से गठबंधन कर लिया था। इस बार भी यही क़यास लगाया जा रहा है।

पिछले चुनावों में मायावती की बसपा का कोई ख़ास प्रदर्शन नहीं रहा था मगर इसके बावजूद उनकी पार्टी इन समय सुर्ख़ियों में है। वर्तमान में पार्टी का खिसकता जनाधार बसपा सुप्रीमों के लिए सबसे बड़ा मुद्दा है। इसे एकजुट करने की चुनौती में उन्होंने भी अपनी रणनीति को अंजाम देना शुरू कर दिया है।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक़ गठबंधन की घोषणा चुनाव आचार संहिता लगने के आसपास होगी। पिछले लोकसभा चुनावों के दौरान 12 जनवरी 2019 को सपा से गठबंधन के दौरान मायावती का कहना था कि भाजपा की देश में दूषित और सांप्रदायिक राजनीति के मद्देनजर उन्होंने यह निर्णय लिया है।

गठबंधन के साथ उस समय मायावती को दस सीटों पर सफलता मिली थी जबकि उससे पहले वर्ष 2014 में अकेले ही लोकसभा चुनाव लड़ने का परिणाम यह हुआ था कि उनकी पार्टी शून्य पर सिमट गई थी और पिछले विधानसभा चुनाव में भी बसपा का सिर्फ एक ही विधायक जीता।

इन परिणामों के आधार पर जानकारों का मानना है कि भले ही मायावती अब तक अकेले ही चुनाव लड़ने की बात कहती रही हैं, लेकिन वो गठबंधन करके चुनाव मैदान में उतरेंगी।

अनुमान लगाया जा रहा है कि बसपा इस बार कांग्रेस से गठबंधन कर सकती है। जानकारों के मुताबिक़ कांग्रेस और बसपा के मिलने से दलित-मुस्लिम गठजोड़ का दोनों ही पार्टियों को फायदा मिलेगा और खासतौर से पश्चिमी उत्तर प्रदेश में ये गठजोड़ बेहद अच्छे नतीजे ला सकता है। गौरतलब है कि बसपा ने तेलंगाना राज्य में भी बीआरएस से हाथ मिलाया है।

एक क़यास यह भी है कि कांग्रेस केवल सपा के भरोसे यूपी में पैर जमाने का नहीं सोच सकती। ऐसे में कांग्रेस सपा के साथ बसपा से भी गठबंधन करना चाहती है। जबकि एक मुद्दा यह भी सामने आ रहा है कि मायावती सपा के रहते कांग्रेस से गठबंधन करने को तैयार नहीं हैं।

बसपा को अपनी स्थिति देखते हुए अगर समझौता करना पड़ा तो यह गठबंधन बनता नज़र आ रहा है। मायावती के सामने खिसकते जनाधार को एकजुट करना इस समय बड़ी चुनौती है। फिलहाल लोकसभा चुनाव में मायावती ने भतीजे आकाश आनंद को कॉर्डिनेटर बनाकर बसपा को मजबूत करने की जिम्मेदारी सौंपी है। जल्दी ही पार्टी अपने बाक़ी पत्ते भी खोलेगी और तस्वीर साफ होगी।

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