श्रीनी श्रीवास्तव वंदे भारत एक्सप्रेस चलाने वाली पहली महिला लोको पायलट बन गई हैं।इसके साथ ही गाजीपुर की श्रीनी ने वंदे भारत एक्सप्रेस की कमान सँभालने के साथ बतौर पहली चालक के रूप में अपना नाम दर्ज करा लिया है। श्रीनी की ख्वाहिश है कि अब वह बुलेट ट्रेन की ड्राइविंग सीट संभालें।
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, वाराणसी से दिल्ली की यात्रा करने वाली वंदे भारत एक्सप्रेस में नौकरी पाने वाली श्रेणी एक साधारण परिवार से आती हैं। गाज़ीपुर में जन्मी श्रीनी पहले से ही रेलवे में कार्यरत थीं।
ख़बरों के मुताबिक़, श्रीनी ने ट्रेनिंग हासिल करने के बाद पहले चेयरकार वंदे भारत और उसके पश्चात् स्लीपर वंदे भारत की ज़िम्मेदारी बतौर चालक संभाली। श्रीनी के पिता पंकज श्रीवास्तव लोक निर्माण विभाग के रिटायर्ड अमीन हैं।
श्रीनी ने राजकीय महिला पॉलिटेक्निक, सुल्तानपुर से डिप्लोमा की पढ़ाई की थी और वह सहायक लोको पायलट बनना चाहती थीं। श्रीनी ने सहायक लोको पायलट की नौकरी का फॉर्म ज़रूर भरा था मगर इस बीच उनको कई ऐसी समस्याओं का सामना करना पड़ा जो एक पुरुष प्रधान समाज में आम हैं।
आखिरकार परिवार और टीचर्स का सहयोग साथ रहा और नौकरी का फॉर्म भरने के साथ उन्होंने अपनी पसंद की मंज़िल पर पहला क़दम रखा। ख़बरों के अनुसार श्रीनी ने अप्रैल 2017 में पूर्वोत्तर रेल के गोरखपुर में सहायक लोको पायलट के पद पर नौकरी हासिल करने में कामयाबी पाई।
श्रीनी श्रीवास्तव ने बहुविषयक पद्धति प्रशिक्षण केंद्र गोरखपुर में ट्रेनिंग प्राप्त की। इसी प्रशिक्षण की बदौलत उन्हें 2023 में उद्घाटित 22415 चेयरकार वंदे भारत एक्सप्रेस की चालक सीट संभालने का मौक़ा मिला और उसके बाद से वह निरंतर आगे देखते हुए अपनी इस यात्रा को बरक़रार रखना चाहती हैं।
मीडिया से बात करते हुए वह कहती हैं कि प्रधानमंत्रीजी नरेंद्र मोदी के तीसरे शपथ ग्रहण समारोह में भी उन्हें शामिल होने का अवसर मिला और यह वंदे भारत चलाने का इनाम था। इस तरह श्रीनी को देशभर में नई पहचान मिली।
वंदे भारत एक्सप्रेस चलाने वाली पहली महिला लोको पायलट की कामयाबी का सेहर अपने सिर बाँध चुकी श्रीनी की अगली ख्वाहिश यह है कि अब वह बुलेट ट्रेन की ड्राइविंग सीट संभालें। श्रीनि का कहना है कि जिस दिन वह बुलेट ट्रेन की चालक सीट संभालेंगी, उस दिन खुद को खुशकिस्मत समझेंगी। सहायक लोको पायलट की नौकरी पर गर्व करने वाली श्रीनी अपने देश की बेटियों के नाम संदेश देती हैं कि ‘बेटियां आगे आएं’।