बच्चों की सुरक्षा का गहराता संकट एक बड़े खतरे का अलार्म है

दुनियाभर में हिंसक टकराव, प्राकृतिक आपदाओं और जलवायु संकट के के चलते लगभग 4.5 करोड़ बच्चे विस्थापन का शिकार हैं। इन बच्चों के हिंसा की चपेट में आने का जोखिम है। इस बीच बढ़ती खाद्य असुरक्षा और टेक्नॉलॉजी के इस्तेमाल में आई तेज़ी से हालात और कठिन हुए हैं। इसके मद्देनज़र, यूएन की एक वरिष्ठ अधिकारी ने संकटों का दंश झेल रहे बच्चों की सुरक्षा के लिए मज़बूत कार्रवाई की पुकार लगाई है।

यूएन ने बच्चों के विरुद्ध हिंसा के विषय पर 20 वर्ष पहले पहली बार अपनी रिपोर्ट जारी की थी। उसके बाद से दुनिया बहुत बदल चुकी है, लेकिन बच्चों के लिए संकट और गहरे हुए हैं।

सोमवार को यूएन महासभा में बच्चों के विरुद्ध हिंसा पर यूएन की विशेष प्रतिनिधि नजत माअल्ला मजिद ने अपनी रिपोर्ट पेश करने के बाद पत्रकारों को जानकारी देते हुए कहा कि बच्चों के लिए मौजूदा स्थिति, नींद से जगा देने वाली एक चेतावनी घंटी होनी चाहिए।

उन्होंने बताया कि हर पाँच में से एक बच्चा अत्यधिक निर्धनता में जीवन गुज़ार रहा है, न केवल निर्धन देशों में बल्कि सम्पन्न देशों में भी। नक़दी हस्तांतरण व सहायता देने के बावजूद ऐसी स्थिति है। इसके अलावा, विश्व भर में खाद्य असुरक्षा और महंगाई बढ़ी है, जबकि कई अन्य देशों में मानवाधिकारों के लिए हालात बद से बदतर हो रहे हैं।

एआई समेत टैक्नॉलॉजी के तेज़ प्रसार ने अवसरों को खोला है, लेकिन बाल यौन शोषण, साइबर बुलीइंग (डराए-धमकाए जाने), जानबूझकर तैयार की जाने वाली झूठी फ़ोटो व वीडियो (डीपफ़ेक) और आपराधिक गतिविधियों में उन्हें शामिल करने की आशंका भी बढ़ी है।

राजनैतिक इच्छाशक्ति की ज़रूरत ज़रूरी
विशेष प्रतिनिधि के अनुसार, मज़बूत राजनैतिक इच्छाशक्ति का प्रदर्शन बहुत अहम है, जिसे बाल संरक्षण और कल्याण के लिए ज़रूरी समर्थन में तब्दील किया जा सकता है। उन्होंने कहा कि बाल हिंसा से निपटने के पुख़्ता उपायों में सफलता, कारगर बहुपक्षवाद पर निर्भर है।

इस क्रम में, यूएन अधिकारी ने बच्चों के विरुद्ध हिंसा पर विराम लगाने के लिए वैश्विक गठबंधन का उल्लेख किया, जिसमें अब तक 55 देश शामिल हो चुके हैं।

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