दुनिया भर में लाखों बच्चों के लिए मोटापा उनकी ज़िंदगी का हिस्सा बनता जा रहा है। इसका प्रभाव उनके दैनिक जीवन के साथ-साथ भावनात्मक रूप से भी पड़ता है। नतीजे में उनका शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य प्रभावित होता है।
अधिक वज़न शरीर में अत्यधिक मात्रा में वसा जमा होने की स्थिति है। इस समस्या के मद्देनज़र विश्व स्वास्थ्य संगठन ने पहली बार उपचार व देखभाल सम्बन्धी अपने दिशा-निर्देश जारी किए हैं।
यूएन एजेंसी के अनुसार, मोटापा (obesity) एक दीर्घकालिक और बार-बार हो सकने वाली बीमारी है, जोकि खान-पान की आदतों, आनुवांशिकी, सेहतमन्द आहार तक पहुँच, बाज़ारी शक्तियों समेत अन्य कारणों का परिणाम है।
हाल के दशकों में मोटापा दुनिया भर में तेज़ी से बढ़ा है, जिसे अक्सर बेहतर खाद्य सुरक्षा, सामाजिक-आर्थिक विकास, खान-पान के तरीक़ों में आ रहे बदलावों, शारीरिक गतिविधियों में कमी और निजी व्यवहार से जोड़ कर देखा जाता है।
विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, मोटापे की वजह से बच्चों व किशोरों को जीवन में बहुत कम आयु से ही स्वास्थ्य और सामाजिक नतीजों का सामना करना पड़ सकता है। यह
मोटापे से ग़ैर-संचारी रोगों, जैसेकि टाइप टू डायबिटीज़ और हृदयवाहिनी रोग होने का जोखिम बढ़ जाता है।
वर्ष 1990 के बाद से अब तक, बच्चों व किशोरों में मोटापा चार गुना बढ़ चुका है। यह 5 से 19 वर्ष आयु वर्ग में दो फ़ीसदी से बढ़कर लगभग आठ फ़ीसदी हो चुका है। साल 2024 में 17 करोड़ बच्चे व किशोर मोटापे की अवस्था में जीवन व्यतीत कर रहे थे। इनमें 7 करोड़ की आयु 5 से 9 वर्ष के बीच है।
बात केवल इतनी ही नहीं है, इस अवस्था को कथित कलंक, भेदभाव, डराए-धमकाए जाने की आशंका बढ़ने से भी जोड़ कर देखा जाता है, जिससे बच्चों व किशोरों का मानसिक स्वास्थ्य प्रभावित हो सकता है। यूएन एजेंसी ने अपनी नई गाइडलाइन्स में, आहार व खान-पान की आदतों में बदलाव लाने, शारीरिक सक्रियता बढ़ाने समेत अन्य उपायों पर बल दिया है।
दिशा निर्देश
यूएन विशेषज्ञों ने मोटापे के उपचार के लिए किसी औषधि के इस्तेमाल या 0-9 वर्ष के आयु के बच्चों के लिए वज़न घटाने वाले उपकरणों से परहेज़ करने की सिफ़ारिश की है।
10-19 वर्ष के किशोरों के लिए स्वीकृत दवाओं, जैसेकि जीएलपी-1 थेरेपी, के ज़रिए उपचार किया जा सकता है। मगर, इन्हें तभी अपनाया जाना चाहिए जब जीवनशैली में बदलाव के लिए अन्य उपाय विफल साबित हो गए हों।
बेरियाट्रिक सर्जरी को सख़्त दिशानिर्देशों में केवल गम्भीर रूप से मोटापे का शिकार लोगों के लिए ही इस्तेमाल में लाया जाना चाहिए। इस सर्जरी के ज़रिए शरीर के पाचन तंत्र को बदल दिया जाता है, जिससे वज़न घटता है।
मोटापे के साथ-साथ, मानसिक स्वास्थ्य की देखभाल पर भी बदल दिया गया है, चूँकि यह बीमारी का कारण भी बन सकता है और उसका नतीजा भी।
बेचैनी, अवसाद, आत्म-विश्वास की कमी से अक्सर खान-पान की आदतों में बदलाव आता है, शारीरिक सक्रियता घटती और व्यक्ति समाज से दूर होता जाता है।
नीतिगत उपाय भी ज़रूरी
इसलिए, यूएन एजेंसी ने कहा है कि मोटापे से निपटने के लिए केवल वज़न घटाने के उपायों से दूर जाना होगा और समग्र स्वास्थ्य कल्याण पर बल देना होगा। इसके लिए यह ज़रूरी है कि व्यवस्था और नीतियों में व्यापक रूप से बदलाव किए जाएं।
संगठन ने ऐसी नीतियों व समाधानों को अहम बताया है जिनसे स्वस्थ आहार और शारीरिक गतिविधियों को बढ़ावा मिलता हो, और जो इन उपायों को लोगों की पहुँच में सुनिश्चित करें।
उदाहरण के लिए, नियामन व्यवस्था के साथ-साथ शहरी नियोजन, परिवहन और सामाजिक संरक्षा के मोर्चे पर क़दम।
संगठन ने कहा है कि हर बच्चे के लिए कम आयु से ही, गुणवत्तापरक स्वास्थ्य सेवाएँ और अनुकूल माहौल तैयार करना होगा, ताकि उन्हें स्वस्थ वज़न हासिल करने और उसे बनाए रखने में मदद मिले।