अरबों लोग आज भी एक सुरक्षित और मूलभूत सुविधाओं वाले घर से वंचित हैं, दुनिया एक विशाल आवास संकट का सामना कर रही है और हिंसक टकराव, आपदाओं और बदलती जलवायु की वजह से यह चुनौती और गम्भीर रूप धारण कर रही है।
हर वर्ष अक्टूबर महीने के पहले सोमवार को विश्व पर्यावास दिवस मनाया जाता है। यह दिवस शहरों व नगरों की स्थिति पर चिन्तन करने और इस बुनियादी अधिकार को पूरा करने के लिए संकल्प मज़बूत करने पर लक्षित है।
‘विश्व पर्यावास दिवस’ (World Habitat Day) के अवसर पर सोमवार, 5 अक्टूबर, को ओमान की राजधानी मस्कट में जुटे देशों के प्रतिनिधियों और नागरिक समाज ने सभी के लिए पर्याप्त आवास व्यवस्था सुनिश्चित किए जाने का आग्रह किया है।
2011 की जनगणना के अनुसार, भारत में पूरी तरह बेघर (खुले आसमान, फुटपाथ या स्टेशनों पर रहने वाले) लोगों की संख्या लगभग 17.7 लाख (1.77 मिलियन) थी, हालांकि सामाजिक कार्यकर्ताओं का मानना है कि वास्तविक संख्या इससे अधिक हो सकती है।
नीति आयोग के आंकड़ों के मुताबिक, भारत में लगभग 41.3% आबादी के पास अपना पक्का मकान नहीं है या वे आवास की कमी से जूझ रहे हैं। रिपोर्ट्स बताती हैं कि भारत की कुल आबादी का लगभग 5.4% और कुल शहरी आबादी का करीब 17.4% हिस्सा झुग्गी-झोपड़ियों या कच्ची बस्तियों में रहता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि पर्याप्त आवास का अर्थ केवल चारदीवारी और छत से बना एक भौतिक ढाँचा नहीं है। साफ पानी, सुरक्षा और क़ानूनी अधिकार के बिना कोई आवास, घर नहीं है, बल्कि निर्धनता में फँसे रहने का जाल है।
टिकाऊ शहरीकरण पर केन्द्रित यूएन एजेंसी की कार्यकारी निदेशक ऐनाक्लॉडिया रॉसबाख ने कहा कि पर्याप्त आवास कोई विलासिता नहीं है। ‘यह गरिमामय जीवन और टिकाऊ शहरों के लिए एक बुनियाद है।”
आगे उन्होंने कहा, ‘एक परिवार के पास छत हो सकती है, लेकिन उसे किराए पर इतना ख़र्च करना पड़ सकता है कि भोजन, शिक्षा या स्वास्थ्य देखभाल के लिए बहुत कम धन बचे. एक घर की क़ीमत सही हो सकती है, लेकिन यह नौकरियों, स्कूलों और परिवहन व्यवस्था से दूर हो सकता है।’
इस अवसर पर विश्व की आवासीय परिस्थितियों से जुड़े जो तथ्य सामने आए उनमें प्रमुख इस तरह हैं-
विश्व भर में, तीन अरब लोगों के पास पर्याप्त आवास की व्यवस्था नहीं है।
1.1 अरब लोग झुग्गियों, अनौपचारिक बस्तियों में रहते हैं, और करोड़ों बेघर हैं.
हिंसक टकराव, आपदाओं और जलवायु परिवर्तन की वजह से यह गम्भीर संकट बन रहा है।
पर्याप्त आवास के अधिकार को अन्तरराष्ट्रीय मानवाधिकार फ़्रेमवर्क में जगह मिली है। यह टिकाऊ विकास लक्ष्यों और नए शहरी एजेंडा की दिशा में प्रगति से भी जुड़ा है।
किसी आवास को तब पर्याप्त माना जाता है, जब वह सात मानदंडों पर खरा उतरता है, जैसेकि सेवाओं की उपलब्धता, रहन-सहन की अच्छी स्थिति, उचित क़ीमत, सही स्थान, और आसान पहुँच।
यूएन महासचिव एंतोनियो गुटेरेश ने इस दिवस पर अपने सन्देश में अन्तरराष्ट्रीय समुदाय के नाम एक अपील जारी करते हुए कहा कि आवास को सार्वजनिक भलाई से जोड़ कर देखा जाना होगा और एक ऐसे विश्व का निर्माण करना होगा, जहाँ हर किसी के पास अपना घर हो।
यूएन प्रमुख ने कहा कि पहले से ही कठिनाइयों से जूझ रहे समुदायों को सबसे अधिक जोखिमों का सामना करना पड़ता है, जबकि उनके पास सीमित संसाधन हैं। यूएन प्रमुख ने पर्याप्त आवास में निवेश करने और अनौपचारिक बस्तियों में कायापलट कर देने वाले बदलावों की पुकार लगाई है ताकि निर्धनता में कमी लाई जा सके, असमानता से निपटा जाए, जलवायु प्रभावों का सामना करने के पुख़्ता उपाय हों और शान्तिपूर्ण व समावेशी समाजों को आकार दिया जा सके।
इस विषय में, उन्होंने राष्ट्रीय व स्थानीय स्तर पर सरकारों के बीच समन्वय, मज़बूत साझेदारियों और निर्णय प्रक्रिया में डेटा के बेहतर इस्तेमाल पर बल दिया है। गौरतलब है कि आवास की कमी को दूर करने के लिए सरकार प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत करोड़ों गरीबों को पक्के मकान उपलब्ध कराने की योजना पर भारत में काम हो रहा है।