मौजूदा रफ़्तार से लैंगिक समानता हासिल करने में 171 वर्ष लग सकते हैं। यह दावा संयुक्त राष्ट्र की एक नई रिपोर्ट में किया गया है। जबकि लगातार घटती वित्तीय सहायता के कारण इस लक्ष्य पर काम करने वाले संस्थानों की कार्रवाई क्षमता भी प्रभावित हो रही है।
संयुक्त राष्ट्र की ताज़ा रिपोर्ट ‘Gender Snapshot 2026’ के अनुसार, लैंगिक समानता से जुड़े सतत विकास लक्ष्य (SDG 5) का एक भी संकेतक 2030 तक हासिल होने की राह पर नहीं है।
रिपोर्ट के मुताबिक़, इन लक्ष्यों में भेदभाव और लैंगिक हिंसा का अन्त करना, जबरन विवाह व महिला जननांग विकृति जैसी हानिकारक प्रथाओं को रोकना, नेतृत्व में महिलाओं की पूर्ण भागेदारी सुनिश्चित करना तथा उनके आर्थिक व सम्पत्ति अधिकारों को मज़बूत करना शामिल है।
हिंसा और भेदभाव
रिपोर्ट के अनुसार, किसी भी देश ने पूर्ण क़ानूनी समानता हासिल नहीं की है। अध्ययन में शामिल 131 देशों में से 51 प्रतिशत में अब भी गम्भीर क़ानूनी कमियाँ हैं।
दुनिया भर में करोड़ों महिलाएँ अब भी गम्भीर हिंसा और भेदभाव झेल रही हैं। लगभग हर पाँच में से एक लड़की की शादी 18 वर्ष से पहले हो जाती है, जबकि 23 करोड़ महिलाएँ और लड़कियाँ महिला जननांग विकृति का सामना कर चुकी हैं।
लगभग हर तीन में से एक महिला अपने जीवनकाल में साथी द्वारा हिंसा या यौन हिंसा की शिकार हुई है। केवल पिछले 12 महीनों में 31 करोड़ 60 लाख महिलाओं ने अंतरंग साथी से शारीरिक या यौन हिंसा झेली।
लगभग दो-तिहाई देशों में महिलाओं के भूमि अधिकारों को पर्याप्त क़ानूनी संरक्षण नहीं मिलता। इनमें 30 प्रतिशत से भी कम देश संयुक्त भूमि पंजीकरण या भूमि प्रशासन में महिलाओं की भागेदारी सुनिश्चित करते हैं।
राजनैतिक जीवन में महिला
रिपोर्ट बताती है कि राजनैतिक जीवन में महिलाओं को अब भी व्यवस्थागत बाधाओं का सामना करना पड़ता है। दुनिया के हर सात में से छह देशों का नेतृत्व पुरुष कर रहे हैं।
इस रिपोर्ट के अनुसार, कुछ देशों में चुनाव लड़ने वाली हर 10 में से आठ महिलाओं को सार्वजनिक जीवन में हिंसा झेलनी पड़ती है। वहीँ चुनाव लड़ने का ख़र्च किसी देश की औसत प्रति व्यक्ति आय से 100 गुना से भी अधिक हो सकता है, जिससे अनेक महिलाएँ दौड़ शुरू होने से पहले ही बाहर हो जाती हैं। ताक़तवर मंत्रालयों में भी महिलाओं की भागेदारी कम है। लगभग 10 में से नौ रक्षा मंत्री और आठ से अधिक वित्त मंत्री पुरुष हैं।
दुनिया भर में केवल छह प्रतिशत सीईओ महिलाएँ हैं और सर्वोच्च अदालतों में 20 प्रतिशत से भी कम का नेतृत्व महिलाओं के हाथ में है। रिपोर्ट के अनुसार, जब आधी आबादी को नेतृत्व और निर्णय प्रक्रिया में बराबर की आवाज़ नहीं मिलती, तो लोकतंत्र और मानवाधिकार दोनों कमज़ोर पड़ते हैं।
प्राथमिकता से बाहर
लैंगिक समानता अब वैश्विक प्राथमिकताओं में पीछे छूटती दिख रही है। विकास सहायता में कटौती के बीच, लैंगिक समानता से जुड़े कार्यक्रम सबसे अधिक प्रभावित हुए हैं। इस क्षेत्र के लिए वित्तीय सहायता 2021 के बाद सबसे निचले स्तर पर है।
पिछले दो वर्षों में हर चार में से एक लैंगिक समानता तंत्र के बजट में कटौती हुई, जबकि हर तीन में से एक की संस्थागत ताक़त घटी। यूएन की 42 प्रतिशत संस्थाओं ने भी अपने प्रयास कमज़ोर पड़ने की बात कही है।
संयुक्त राष्ट्र के आर्थिक और सामाजिक मामलों के अवर महासचिव ली जुनहुआ ने कहा, “2026 जैंडर स्नैपशॉट रिपोर्ट दिखाती है कि यह स्थिति अपरिहार्य नहीं है।” उन्होंने कहा, “यह हमारे फ़ैसलों का नतीजा है, जिसे आँकड़े स्पष्ट करते हैं। लैंगिक समानता और जवाबदेह संस्थानों में निवेश कोई बोझ नहीं, बल्कि 2030 एजेंडा के सर्वजन के लिए समान अधिकार और शक्ति के वादे की ओर लौटने का सबसे तेज़ रास्ता है।”