वर्ल्ड कबाब डे 2026: आज पूरी दुनिया में कबाब की बेशुमार किस्में शौक़ से खाई और परोसी जाती हैं

खाने का ज़िक्र हो और लखनऊ का नाम न आये तो नाइंसाफी होगी। लेकिन दस जुलाई का दिन वह ख़ास मौका मुहैया कराता है जब लखनऊ को उसकी पाक कला की विरासत के लिए याद किया जाना चाहिए।

विश्व कबाब दिवस, 10 जुलाई 2026 को मनाया जा रहा है। यह दिन दुनिया भर में कबाब के समृद्ध इतिहास के साथ इसकी विविधता का सम्मान करता है। इस दिन का चुनाव जुलाई के दूसरे शुक्रवार के रूप में किया गया है और इस चयन के मुताबिक़ इस साल का विश्व कबाब दिवस दस जुलाई को है।

क्यूंकि वर्ल्ड कबाब डे 2026 भारत के मशहूर कबाबों का जश्न मनाता है और ऐसे में लखनऊ के मुंह में घुल जाने वाले गलावटी कबाब से लेकर हैदराबाद के स्मोकी सीख कबाब तक – जो देश की शानदार पाक कला की विरासत को दिखाते हैं।

भारत की कबाब संस्कृति लखनऊ और हैदराबाद से बहुत आगे तक फैली हुई है। उत्तर प्रदेश के काकोरी कबाब से लेकर रेशमी कबाब और तटीय इलाकों के सीफ़ूड कबाब भी इसमें शामिल हैं। हर क्षेत्र का अपना अनोखे ज़ायका है और इस ज़ायके के पीछे इन्हे बनाए जाने की पारम्परिक से आधुनिक तकनीक तक शामिल हैं।

कई मान्यताओं के अनुसार, कबाब की उत्पत्ति तुर्की में हुई थी। दरअसल तुर्की में ‘कबाब’ का मतलब ‘भुना हुआ मांस’ होता है। ऐसा माना जाता है कि शुरुआत में मांस के टुकड़ों को कटार पर चढ़ाने के बाद उसे भूनकर बनाया जाता था।

कबाब के बारे में जानकारों का कहना है कि 1800 के दशक में कबाबों के निर्माण का इतिहास 19वीं शताब्दी में मध्य पूर्व में देखा जा सकता है। विशेष रूप से तुर्की और फारस जैसे क्षेत्रों में, जहां कटार और ग्रिल्ड मांस लोकप्रिय हुआ करते थे।

1900 के दशक में ग्रीक सोउवलाकी या भारतीय टिक्का जैसे कबाब अस्तित्व में आए। ये कबाब 20वीं सदी में दुनिया भर में फैल गए और एक प्रिय अंतर्राष्ट्रीय व्यंजन बन गए।

इस क्रम में बात करें तो भारतीय शेफ़ पारंपरिक स्वाद को बनाए रखते हुए शाकाहारी कबाब, पनीर कबाब, सोया कबाब, दही कबाब के अलावा फ़्यूज़न डिशेज़ के साथ प्रयोग कर रहे हैं। ये नए प्रयोग कबाब को खाने के शौकीनों की नई पीढ़ी से परिचित करा रहे हैं।

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