आज के दौर में सोशल मीडिया महज़ मनोरंजन का साधन मात्र नहीं, बल्कि यह अरबों डॉलर की एक समानांतर और आत्मनिर्भर ‘क्रिएटर इकोनॉमी’ का आधार स्तंभ बन चुका है।
प्रत्येक वर्ष 30 जून को विश्व सोशल मीडिया दिवस मनाया जाता है। इसकी शुरुआत वर्ष 2010 में वैश्विक डिजिटल मीडिया मंच Mashable द्वारा की गई थी। इसे मनाए जाने का मक़सद महज़ सोशल मीडिया की लोकप्रियता का जश्न मनाना नहीं, बल्कि समाज, लोकतंत्र, अर्थव्यवस्था, संस्कृति और मानवीय संबंधों की संरचना और इसके प्रभाव को समझना है।
इसकी शुरुआत का क्रम देखें तो सबसे पहले इंटरनेट रहा, जहाँ प्रारंभिक दौर में संवाद ईमेल से होता था। जब 1990 के दशक में इंटरनेट का विस्तार हुआ तब ऑनलाइन चैट चलन में आई। साल 1997 में SixDegrees.com नामक वेबसाइट के उदय को दुनिया का पहला वास्तविक सोशल नेटवर्क माना जाता है। इस प्लेटफॉर्म के लिए पहली बार यूज़र को अपनी प्रोफाइल बनाने, लॉग-इन करने और मित्रों की एक सूची तैयार करने की बुनियाद पड़ी।
नई सदी की शुरुआत के साथ वर्ष 2002-2003 के दौरान Friendster और MySpace जैसे प्लेटफॉर्म्स ने युवाओं के बीच संगीत, कला और आपसी संवाद के नए रस्ते खोले। साल 2003 में LinkedIn का आगमन हुआ, इसने व्यावसायिक नेटवर्किंग की आवश्यकता को समझते हुए पेशेवर समाज को एक मंच दिया।
मगर यह सब एक शुरुआत थी और सोशल मीडिया का अगला ऐतिहासिक कदम फेसबुक बना। साल 2004 में हार्वर्ड विश्वविद्यालय के एक छात्रवास द्वारा मजाज़ एक कमरे से शुरू होने वाले फेसबुक (वर्तमान में मेटा) ने दुनिया को एक मंच पर ला दिया और जैसे सारी दूरिया मिट गईं। ये मार्क जुकरबर्ग और उनके साथी थे जिन्होंने इस क्रांति को अंजाम दिया और सर्च इंजन की बदौलत फेसबुक ने दुनियाभर के लोगों को अपनी पुरानी यादोंके साथ जोड़ने का जरिया प्रस्तुत किया।
फिर इस क्रम में कई नए नाम जुड़ते गए। इनमें वर्ष 2006 में 140 अक्षरों की अनूठी सीमा के साथ Twitter (वर्तमान में ‘एक्स’) का उदय हुआ। यहाँ दुनिया भर के राजनेता, पत्रकार, विचारक और आमजन एक साथ आए और हैशटैग की दुनिया को हमारी दुनिया के समांतर स्थान मिला। अब जो खास था वह ट्रेंड करता था। फिर इससे भी सरल रूप में दुनिया के सामने आया व्हाट्सएप्प जिसने तमाम गैजेट्स को पछाड़कर अपना अलग ही वर्चस्व बना लिया।
सोशल मीडिया इक्कीसवीं सदी में केवल संचार की भूमिका में नहीं है बल्कि यह विचारों के आदान-प्रदान के साथ सामाजिक आंदोलनों, राजनीतिक विमर्श, व्यापार, शिक्षा के अलावा जनमत निर्माण और मनोरंजन तथा सांस्कृतिक अभिव्यक्ति का सबसे सशक्त वैश्विक मंच बन चुका है।
सोशल मीडिया ने पूरी दुनिया को एक ऐसे ‘ग्लोबल विलेज’ में बदल दिया है, जहां किसी भी घटना की प्रतिध्वनि कुछ ही क्षणों में पृथ्वी के एक छोर से दूसरे छोर तक पहुंच जाती है।
ब्लॉगर्स, यूट्यूबर्स, इंस्टाग्राम इन्फ्लुएंसर्स और पॉडकास्टर्स ने नौकरियों के बंधे ढर्रे को तोड़कर नए और अत्यंत आकर्षक करियर विकल्पों को अपनाया और कामयाब भी हुए हैं। कई वैश्विक और स्थानीय ब्रांड्स अब टेलीविजन या प्रिंट की बजाए विज्ञापनों के लिए सीधे इन इन्फ्लुएंसर्स तक पहुँच बना रहे हैं।
हालाँकि जहाँ एक और सोशल मीडिया के ढेरों फायदे हैं वहीँ इसके नुकसान से भी इंकार नहीं किया जा सकता। इनमे फेक न्यूज़ से लेकर दुष्प्रचार, ट्रोलिंग, साइबर अपराध, निजता के हनन सहित एल्गोरिदम-आधारित सूचना-नियंत्रण जैसी गंभीर समस्याएं भी पैदा की हैं।
वर्तमान में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के विकास के साथ डीपफेक तकनीक ने कई संकट भी पैदा किए हैं। अब असली और नकली को लेकर एक अलग ही संशय के हालत बन चुके हैं। वही यह किसी की भी निजता को अपूरणीय क्षति पहुंचा रहा है, ऐसे में कई राष्ट्रों में सोशल मीडिया को लेकर नए नियम बन रहे हैं। कई देशों ने इसे काम उम्र बच्चों के लिए प्रतिबंधित भी किया है।
तमाम सुविधाओं से लैस यह तकनीक जितनी सशक्त है, उतनी ही संवेदनशील भी है। ऐसे में इसका प्रयोग सबसे महत्वपूर्ण मुद्दा है। यह इस बात पर निर्भर करता है कि इसका उपयोग किस उद्देश्य के तहत किया जा रहा है।