साइकोलॉजी कहती है कि अक्सर तनाव को कम करने और खुद पर कंट्रोल महसूस करने की कोशिश में लोग कई आदतों को अपना लेते हैं। इस प्रक्रिया का ज़्यादातर हिस्सा अनजाने में होता है, क्योंकि इंसान स्वाभाविक रूप से अपने आस-पास के लोगों को देखकर सीखते हैं।
साइकोलॉजी ‘सोशल लर्निंग थ्योरी’ (सामाजिक सीख का सिद्धांत) की ओर भी इशारा करती है, जिसे अल्बर्ट बंडूरा ने पेश किया था। यह थ्योरी बताती है कि लोग अक्सर उन व्यवहारों को अपनाते हैं और उनकी नकल करते हैं जिन्हें वे बार-बार देखते हैं।
इकोनॉमिक टाइम्स की एक रिपोर्ट से पता चलता है कि, बहुत से बड़ों में यह आदत बिना सोचे-समझे बन जाती है। वे अपनी डेस्क पर बैठते हैं, उंगलियां चटकाते हैं, गर्दन घुमाते हैं और एक जानी-पहचानी ‘पॉपिंग’ आवाज़ सुनते हैं। कुछ मिनटों बाद, वे फिर से ऐसा करते हैं। उनके साथी इस पर ध्यान देते हैं जबकि परिवार के सदस्य इस पर टिप्पणी करते हैं। इस बारे में कुछ लोग तो यह भी कहते हैं कि वे इसके बिना अपने दिन की शुरुआत नहीं कर सकते। पहली नज़र में, यह एक बेमतलब की आदत लग सकती है। लेकिन साइकोलॉजी बताती है कि अक्सर इसके पीछे कुछ और भी हो रहा होता है।
आदत के चक्र व्यवहार को नेचर में शामिल कर देते हैं।
एक और व्याख्या चार्ल्स डुहिग द्वारा लोकप्रिय किए गए आदत चक्र सिद्धांत से मिलती है। हर आदत एक पैटर्न का पालन करती है। इसमें- पहले एक ट्रिगर, फिर एक नियमित प्रक्रिया और इसके बाद एक इनाम का क्रम है।
उदाहरण के लिए इसे यूं समझ सकते हैं-
ट्रिगर: बहुत देर तक बैठे रहना।
नियमित प्रक्रिया: उंगलियां या गर्दन चटकाना।
इनाम: अस्थायी राहत।
मस्तिष्क जल्दी ही सीख जाता है कि यह क्रम काम करता है। समय के साथ, व्यवहार स्वचालित हो जाता है। लोगों को शायद यह एहसास भी न हो कि वे ऐसा कर रहे हैं।
मनोवैज्ञानिक मानते हैं कि तनाव अक्सर लोगों के सचेत रूप से स्वीकार करने से पहले ही शारीरिक रूप से प्रकट हो जाता है। इस अवधारणा को सोमाटाइजेशन के रूप में जाना जाता है, जहां भावनात्मक तनाव शारीरिक संवेदनाओं के माध्यम से खुद को व्यक्त करता है। वहीँ कई वयस्क विशिष्ट क्षेत्रों में तनाव महसूस करते हैं, खासकर:
कंधे
गर्दन
जबड़ा
हाथ
जोड़ों को चटकाना उस जमा तनाव की प्रतिक्रिया हो सकती है। आधुनिक उदाहरण: लैपटॉप पर आठ या उससे अधिक घंटे काम करने वाले पेशेवर अक्सर गर्दन में अकड़न और दिन भर बार-बार स्ट्रेचिंग करने की आदत की शिकायत करते हैं। लंबे समय तक स्थिर रहने के बाद शरीर स्वाभाविक रूप से गति चाहता है।
एक्सपर्ट मानते हैं कि कभी कभार उंगलियां चटकाने से कोई नुकसान नहीं मगर रोज ऐसा करना खतरनाक हो सकता है। एक्सपर्ट के मुताबिक, बार-बार उंगलियां चटकाने से जोड़ के सॉफ्ट टिश्यू कमज़ोर हो जाते हैं और जॉइंट डिसलोकेट होने का खतरा बढ़ता है।
यही नहीं, लंबे समय तक लोग ऐसा करने वालों में अर्थराइटिस का जोखिम भी बढ़ता है। यह आदत बच्चों के लिए अधिक नुकसानदायक है। बच्चों की हड्डियां सॉफ्ट होती हैं और बार-बार उंगलियां चटकाने से उनकी फिंगर्स टेढ़ी हो सकती हैं। कई बार फ्रैक्चर की नौबत भी आ जाती है।