दुनिया भर में आवास की बढ़ती लागत, जलवायु परिवर्तन के झटके और आपसी टकराव, लाखों लोगों को सुरक्षित आश्रय से वंचित कर रहे हैं। अज़रबैजान के बाकू में आरम्भ हो रहे 13वें संयुक्त राष्ट्र विश्व शहरी मंच (WUF13) में दुनिया भर से आए हज़ारों प्रतिनिधि, इस वैश्विक आवास संकट के समाधान तलाश करने के लिए मन्थन करेंगे।
यूएन पर्यावास (UN-Habitat) और अज़रबैजान द्वारा संयुक्त रूप से आयोजित इस सम्मेलन में वैश्विक नेता, मेयर, शहरी नियोजन विशेषज्ञ, नागरिक समाज और निजी क्षेत्र के प्रतिनिधि एक साथ आ रहे हैं। इस मंच का मुख्य विषय एक पुकार है-दुनिया को आवास देना: सुरक्षित और सहनसक्षम शहर और समुदाय।
संयुक्त राष्ट्र के अनुसार, दुनिया भर में आज लगभग 2 अरब 80 करोड़ लोग असुरक्षित और ख़राब परिस्थितियों में रह रहे हैं, जबकि 30 करोड़ से अधिक लोगों के पास अपना कोई घर नहीं है। साल 2050 तक दुनिया की क़रीब 70 प्रतिशत आबादी के शहरों में बसने की उम्मीद है, जिससे यह संकट और भी गम्भीर रूप ले सकता है।
यूएन पर्यावास की प्रमुख ऐनाक्लाउडिया रॉसबैक ने इसे एक “वैश्विक आवास संकट” बताया है, जो अब सिर्फ़ वैश्विक दक्षिण यानि विकासशील देशों तक सीमित नहीं है, बल्कि वैश्विक उत्तर यानि विकसित देशों में भी महसूस किया जा रहा है।
बढ़ती महंगाई और मध्य पूर्व में चल रहे युद्ध जैसे अन्तरराष्ट्रीय संकटों ने, वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला को प्रभावित करके, इस स्थिति को और भी बदतर बना दिया है। संयुक्त राष्ट्र ने आगाह किया है कि इसका असर जीवन के हर पहलू पर पड़ता है, जिससे स्वास्थ्य और शिक्षा प्रणालियों पर दबाव बढ़ता है और सामाजिक ताना-बाना कमज़ोर होता है।
संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम (UNDP) की उप निदेशक फ़्रांसिन पिकअप ने ज़ोर देकर कहा कि इसके लिए आवास, जलवायु जुझारूपन, शासन और स्थानीय वित्त पोषण को एक साथ जोड़ने वाले एकीकृत शहरी समाधानों की ज़रूरत है।
मंच का एक मुख्य विषय अनियोजित बस्तियों (झुग्गी-झोपड़ियों) का तेज़ी से बढ़ना भी होगा, जहाँ रहने वाले लोगों के पास ज़मीन का कोई क़ानूनी अधिकार नहीं होता और वे बेहद असुरक्षित घरों में रहते हैं। आज लगभग एक अरब 10 करोड़ लोग झुग्गियों में रह रहे हैं, जिनमें 35 से 50 करोड़ बच्चे हैं, और अनुमान है कि आने वाले दशकों में यह संख्या दो अरब और बढ़ सकती है।
हालाँकि, यूएन-हैबिटेट इस दृष्टिकोण को बदलने की हिमायत कर रहा है कि इन बस्तियों को केवल एक समस्या के रूप में नहीं देखा जाए, क्योंकि कई मामलों में ये बस्तियाँ ही, लाखों लोगों को शहरों में सिर छुपाने का एकमात्र सहारा देती हैं। संयुक्त राष्ट्र के अनुसार, साल 2022 के अन्त तक दुनिया भर में 12 करोड़ 30 लाख से अधिक लोग जबरन विस्थापित हुए थे, जिनमें से 60% से अधिक ने, शहरी क्षेत्रों में शरण ली थी।
घर खोने का मतलब सिर्फ़ छत खोना नहीं है, बल्कि इससे समुदाय बिखर जाते हैं और आजीविका छिन जाती है. बाकू में ध्यान सिर्फ़ आश्रय देने पर नहीं, बल्कि लोगों के जीवन को फिर से पटरी पर लाने पर होगा, जिसमें मोहल्लों – बस्तियों को सँवारना और रोजगार के अवसर पैदा करना शामिल है।
अनुमानों के अनुसार, जलवायु परिवर्तन दुनिया भर में, वर्ष 2040 तक 16 करोड़ 70 लाख घरों को नष्ट कर सकता है। दूसरी ओर, इमारतें ख़ुद कार्बन उत्सर्जन का एक बड़ा स्रोत हैं; निर्माण क्षेत्र वैश्विक ऊर्जा-सम्बन्धी कार्बन उत्सर्जन के 34 प्रतिशत हिस्से के लिए ज़िम्मेदार है। इसलिए, यह मंच इस बात पर विचार करेगा कि जलवायु संकट को बढ़ाए बिना, अधिक आवासों का निर्माण कैसे किया जाए।
ऐनाक्लाउडिया रॉसबैक कहती हैं, “हम क्या बनाते हैं, किस तरह बनाते हैं और कहाँ बनाते हैं, इन सभी का प्राकृतिक संसाधनों और आपदाओं से निपटने की हमारी क्षमता पर सीधा असर पड़ता है।”
बताते चलें कि 2001 में संयुक्त राष्ट्र महासभा द्वारा स्थापित और यूएन-हैबिटेट द्वारा आयोजित दो वर्ष में एक बार आयोजित होने वाला यह मंच, स्थाई शहरीकरण पर दुनिया का अग्रणी अन्तरराष्ट्रीय सम्मेलन है।
वर्ष 2002 में नैरोबी में इसके पहले सत्र के बाद से, यह दुनिया के विभिन्न शहरों में आयोजित होता आया है। बाकू में हो रहे इस मंच में हिस्सा लेने के लिए 182 देशों से 40 हज़ार से अधिक प्रतिभागियों ने पंजीकरण कराया है।