देश में हर वर्ष लगभग 34 लाख टन प्लास्टिक कचरा पैदा होता है, जिसमें से लगभग 40 प्रतिशत एकत्र नहीं हो पाता और नदियों, मिट्टी व शहरी पारिस्थितिकी तंत्रों में पहुँच जाता है।
प्लास्टिक प्रदूषण समस्या की गम्भीरता को देखते हुए संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम ने प्लास्टिक प्रदूषण से निपटने के लिए ठोस सामूहिक कार्रवाई की ज़रूरत पर ज़ोर दिया है। उनके अनुसार अब केवल रीसायकलिंग से समस्या का समाधान नहीं होगा।
भारत में संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (UNEP) ने मुम्बई में आयोजित एक उच्च-स्तरीय संवाद में ज़ोर दिया है कि अब ज़रूरत है कि उत्पादों और पैकेजिंग में प्लास्टिक का उपयोग घटाया जाए, उन्हें नए सिरे से तैयार किया जाए, और पुनः उपयोग को बढ़ावा दिया जाए।
इस उद्योग संवाद का विषय था, “काम जारी है: उत्पादों और पैकेजिंग से प्लास्टिक का बोझ कैसे घटाएँ।” इसमें सरकार, उद्योग, वित्तीय संस्थानों, वित्तीय संस्थानों, अन्तरराष्ट्रीय संगठनों और नागरिक समाज के प्रतिनिधियों ने हिस्सा लिया।
यह संवाद संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (UNEP) और उसके साझीदारों की उन कोशिशों का हिस्सा है जिनका उद्देश्य, प्लास्टिक मूल्य श्रृँखला में ऐसे समाधान खोजना है जिन्हें बड़े पैमाने पर अपनाया जा सके।
गौरतलब है कि भारत में प्लास्टिक प्रदूषण एक गम्भीर पर्यावरणीय चुनौती बना हुआ है। बढ़ती खपत और सिंगल यूज़ सहित बहु-परत प्लास्टिक के बड़े पैमाने पर इस्तेमाल ने इस समस्या को और बढ़ा दिया है। इस उद्योग संवाद में बहु-परत प्लास्टिक वस्तुओं को एक बड़ी चुनौती के रूप में रेखांकित किया गया, क्योंकि उनका संग्रहण मूल्य कम है और उनकी रीसायकलिंग के विकल्प सीमित हैं।
देश में हर वर्ष लगभग 34 लाख टन प्लास्टिक कचरा पैदा होता है, जिसमें से लगभग 40 प्रतिशत एकत्र नहीं हो पाता और नदियों, मिट्टी व शहरी पारिस्थितिकी तंत्रों में पहुँच जाता है।
हालाँकि प्लास्टिक अपशिष्ट प्रबन्धन नियमों में संशोधन ((Amendment) 2022), कुछ एकल-उपयोग प्लास्टिक वस्तुओं पर प्रतिबन्ध, और विस्तारित उत्पादक दायित्व व्यवस्था (EPR) लागू होने जैसे क़दम उठाए गए हैं। फिर भी, इस चुनौती से निपटने के लिए कई पक्षों की समन्वित और ठोस कार्रवाई की आवश्यकता बनी हुई है।
चर्चा में इस बात पर ज़ोर दिया गया कि केवल कचरा प्रबन्धन और रीसायकलिंग पर निर्भर रहना पर्याप्त नहीं होगा। अब ज़रूरत ऐसे उपायों पर ध्यान देने की है जो समस्या को शुरू में ही कम करें, जैसेकि प्लास्टिक का उपयोग घटाना, पैकेजिंग को नए ढंग से डिज़ाइन करना, और पुनः उपयोग की व्यवस्थाओं को बढ़ावा देना।
भारत में यूएनईपी के प्रमुख डॉक्टर बालाकृष्ण पिसुपति ने कहा कि प्लास्टिक प्रदूषण से निपटने के लिए केवल तकनीकी समाधान पर्याप्त नहीं हैं। इसके लिए उत्पादन, उपभोग और नीतियों के स्तर पर व्यापक बदलाव की ज़रूरत है।
भारतीय रिज़र्व बैंक के कार्यकारी निदेशक आर केसवन ने कहा कि टिकाऊ बदलावों को गति देने में वित्तीय तंत्र की अहम भूमिका है. उन्होंने हरित वित्त और जलवायु-अनुकूल निवेश जैसे उपायों पर ज़ोर दिया।
इस अवसर पर “Work in Progress” नामक एक संकलन भी जारी किया गया, जिसमें प्लास्टिक की मौजूदगी कम करने के लिए उद्योग जगत के अनुभव और उदाहरणों को संकलित किया गया है।
सत्र में ये विचार भी उभर कर आए कि नवाचार, बुनियादी ढाँचे और परिपत्र व्यवस्था को सहारा देने वाले कारोबारी मॉडलों को बड़े पैमाने पर आगे बढ़ाने के लिए वित्त तक पर्याप्त पहुँच बेहद ज़रूरी होगी। इस संवाद का एक अहम नतीजा यह रहा कि उद्योग जगत ने ‘इंडिया प्लास्टिक पैक्ट’ और प्रस्तावित कॉरपोरेट समूह जैसे मंचों के ज़रिये सामूहिक कार्रवाई के समर्थन में मज़बूत सहमति जताई।