इज़राइल के लगभग हर तीसरे छात्र ने देश छोड़ने के बारे में सोचना शुरू कर दिया है: सर्वे

इज़रायल में हुए एक सर्वे से पता चलता है कि यहाँ लगभग हर तीसरे छात्र ने देश छोड़ने के बारे में सोचना शुरू कर दिया है। जो छात्र देश छोड़ने के बारे में सोच रहे हैं, उनमें से 79 प्रतिशत ने रहने के खर्च को एक मुख्य कारण बताया, 46 प्रतिशत ने सुरक्षा की स्थिति का जिक्र किया, 20 प्रतिशत ने रोजगार के अवसरों की बात की और 20 प्रतिशत ने राजनीतिक व कूटनीतिक संकट को कारण बताया।

इज़राइली छात्रों पर किए गए एक सर्वे से पता चला है कि उनके खर्च बढ़ रहे हैं, वे आर्थिक रूप से अपने माता-पिता पर अधिक निर्भर हो गए हैं, रिज़र्व सैनिकों को संघर्ष करना पड़ रहा है अपने भविष्य को लेकर उनके संदेह भी बढ़ रहे हैं। इस सर्वे को जेरुसलम पोस्ट ने प्रकशित किया है। करीब बारह हज़ार इज़राइली छात्रों पर किया गया यह सर्वे इज़राइल में उच्च शिक्षा के कारण छात्रों पर पड़ने वाले आर्थिक और भावनात्मक बोझ को उजागर करता है।

सरकार पर भरोसा कम होने के कारण, लगभग 10 में से 3 छात्र इज़राइल छोड़ने के बारे में सोच रहे हैं। आर्थिक और सुरक्षा की स्थिति भी इस बात को प्रभावित कर रही है कि छात्र इज़राइल में अपने भविष्य को किस तरह देखते हैं।

सर्वे में शामिल लगभग 29 प्रतिशत लोगों ने कहा कि वे अपनी पढ़ाई पूरी करने के बाद किसी दूसरे देश में जाने पर विचार कर सकते हैं, जबकि पिछले साल यह आंकड़ा 26 प्रतिशत था। वहीं 56 प्रतिशत लोगों ने कहा कि वे देश छोड़ने के बारे में नहीं सोच रहे हैं, जबकि 15 प्रतिशतलोग अभी भी किसी नतीजे पर नहीं पहुंचे हैं।

‘नेशनल यूनियन ऑफ़ इज़राइली स्टूडेंट्स’ के 2026 के सर्वे के अनुसार जो पिछले साल की तुलना में 28 NIS अधिक है। लगभग आधे छात्र आर्थिक मदद के लिए अपने माता-पिता पर निर्भर हैं और 29 फीसद छात्र ग्रेजुएशन के बाद इज़राइल छोड़ने पर विचार कर रहे हैं। यह सर्वे रविवार से शुरू होने वाले शैक्षणिक सत्र से ठीक पहले जारी किया गया है।

आर्थिक कठिनाइयों के अलावा सर्वे में उन छात्रों पर युद्ध के प्रभाव को भी दिखाया गया है जो रिज़र्व सैनिक के तौर पर काम कर चुके हैं। इनमें से 64 प्रतिशत छात्रों ने बताया कि पढ़ाई में लौटने के बाद उन्हें भावनात्मक और सामाजिक चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। वहीं, कुल छात्रों में से 38 प्रतिशत का मानना ​​है कि उनके शिक्षण संस्थान उन्हें ‘आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस’ के दौर और लेबर मार्केट (श्रम बाज़ार) में हो रहे बदलावों के लिए ठीक से तैयार नहीं कर रहे हैं।

सर्वे के अनुसार, 81 प्रतिशत छात्र अपनी पढ़ाई के साथ-साथ काम भी करते हैं, जबकि 2024 में यह आंकड़ा 79 प्रतिशत था। काम करने वाले छात्र महीने में औसतन 97 घंटे काम करते हैं और लगभग 6,235 NIS (ग्रॉस) कमाते हैं। काम और पढ़ाई दोनों को एक साथ संभालने के बावजूद, केवल 49 प्रतिशत छात्र ही अपने शैक्षणिक कोर्स से जुड़े क्षेत्रों में काम कर रहे हैं।

इसमें सबसे बड़ा खर्च आवास (रहने की जगह) और घर के रख-रखाव का है जो औसतन 3,155 NIS प्रति माह है। इसके बाद घर के राशन पर 1,463 NIS, मनोरंजन पर 751 NIS और परिवहन (आने-जाने) पर 724 NIS का खर्च आता है। इसमें क्षेत्रीय असमानताएँ भी देखने को मिलती हैं। सेंट्रल डिस्ट्रिक्ट में सबसे ज़्यादा औसत मासिक खर्च 7,258 NIS दर्ज किया गया, जबकि हाइफ़ा डिस्ट्रिक्ट में यह 6,392 NIS था।

लगभग आधे छात्रों (49प्रतिशत) को अपने माता-पिता से आर्थिक मदद मिलती है, जो पिछले साल के 46 प्रतिशत से ज़्यादा है। यह औसत मासिक मदद 2,252 NIS है, जो पिछले साल के मुकाबले 100 NIS अधिक है। परिवार से मिलने वाली मदद के अलावा, हर पाँच में से एक छात्र ने अपनी पढ़ाई के दौरान लोन लिया है। लोन लेने वालों में से 61 प्रतिशत ने 20,000 NIS से ज़्यादा का लोन लिया।

औसत लोन की राशि 49,849 NIS तक पहुँच गई, जो पिछले साल से 1,716 NIS ज़्यादा है। लोन लेने वाले आधे छात्रों ने बताया कि शैक्षणिक वर्ष पूरा करने में लोन से उन्हें काफी या बहुत ज़्यादा मदद मिली।

सर्वे में शामिल आधे लोग किराए के अपार्टमेंट या सबलेट में रहते हैं, जबकि 31 प्रतिशत अपने माता-पिता के साथ रहते हैं। आर्थिक कठिनाइयाँ छात्रों की भविष्य की योजना बनाने की क्षमता पर भी असर डाल रही हैं। लगभग 67 प्रतिशत छात्र हर महीने नियमित रूप से पैसे नहीं बचा पाते, जबकि 38 प्रतिशत का मानना ​​है कि वे कभी अपना घर नहीं खरीद पाएँगे। फिर भी, यह पिछले साल के मुकाबले एक सुधार है, जब 42 प्रतिशत छात्रों का मानना ​​था कि वे कभी अपना घर नहीं खरीद पाएँगे।

आवास की स्थिति का असर रहने-सहने के हालात पर भी पड़ रहा है। लगभग 22 प्रतिशत छात्रों ने बताया कि रहने के खर्च या किराए की वजह से उन्हें अपने आवास की गुणवत्ता से समझौता करना पड़ा, जबकि 14 प्रतिशत छात्र वापस अपने माता-पिता के घर रहने चले गए।

सर्वे के सबसे अहम नतीजों में से एक, उच्च शिक्षा बीच में ही छोड़ देने (ड्रॉप आउट) के जोखिम से जुड़ा है। लगभग 33 प्रतिशत छात्रों ने बताया कि उन्होंने पिछले साल पढ़ाई छोड़ने के बारे में सोचा था, जैसा कि सबसे पहले ‘वाला’ (Walla) ने रिपोर्ट किया था। पढ़ाई छोड़ने के बारे में सोचने वालों में से 50 प्रतिशत ने इसका मुख्य कारण आर्थिक कठिनाइयों को बताया, 41 प्रतिशत ने पढ़ाई के भारी बोझ (academic workload) को संभालने में आ रही दिक्कतों का ज़िक्र किया, और 22 प्रतिशत ने मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी समस्याओं के बारे में बताया।

रिज़र्व सैनिक (रिज़र्विसिस्ट) कैंपस तो लौट आए हैं, लेकिन सामान्य जीवन में वापस लौटने के लिए उन्हें संघर्ष करना पड़ रहा है। युद्ध का असर छात्रों की शैक्षणिक ज़िंदगी पर लगातार पड़ रहा है। सर्वे में शामिल लगभग 27 प्रतिशत लोगों ने बताया कि शैक्षणिक वर्ष के दौरान उन्हें रिज़र्व ड्यूटी के लिए बुलाया गया था, जबकि पिछले सर्वे में यह आंकड़ा 23 प्रतिशत था। इसके अलावा, 16 प्रतिशत लोगों ने बताया कि वे रिज़र्व ड्यूटी करने वालों के जीवनसाथी या पार्टनर हैं।

रिज़र्व ड्यूटी करने वाले छात्रों में से 64 प्रतिशत ने बताया कि ड्यूटी से लौटने के बाद अपनी पढ़ाई फिर से शुरू करना, भावनात्मक और सामाजिक रूप से काफी या बहुत अधिक चुनौतीपूर्ण था। लगभग आधे (47%) छात्रों ने महसूस किया कि जो छात्र रिज़र्व ड्यूटी पर नहीं गए थे, उनके साथ उनका जुड़ाव कम हो गया है, वे खुद को अलग-थलग महसूस करने लगे हैं, या उन्हें लगता है कि दूसरे छात्र उनकी स्थिति को समझ नहीं पाते।

ये मुश्किलें केवल भावनात्मक और सामाजिक चुनौतियों तक ही सीमित नहीं हैं। रिजर्व सर्विस में शामिल छात्रों में से केवल 43 प्रतिशत ने बताया कि उन्हें मिली शैक्षणिक सुविधाओं—जैसे असाइनमेंट जमा करने की समय-सीमा में छूट, उपस्थिति (अटेंडेंस) से राहत, और परीक्षा की विशेष तारीखें से उन्हें अपना छूटा हुआ कोर्सवर्क पूरा करने में काफी या बहुत अधिक मदद मिली।वहीं अन्य 26% लोगों ने कहा कि दी गई सुविधाओं से उन्हें बहुत कम या बिल्कुल भी मदद नहीं मिली।

जो छात्र देश छोड़ने के बारे में सोच रहे हैं, उनमें से 79 प्रतिशत ने रहने के खर्च को एक मुख्य कारण बताया, 46 प्रतिशत ने सुरक्षा की स्थिति का जिक्र किया, 20 प्रतिशत ने रोजगार के अवसरों की बात की और 20 प्रतिशत ने राजनीतिक व कूटनीतिक संकट को कारण बताया।

लगभग 63 प्रतिशत छात्रों का मानना ​​है कि मौजूदा सरकार उनके हितों का बिल्कुल भी ध्यान नहीं रखती या बहुत सीमित रूप में ही ध्यान रखती है। पिछले साल यह आंकड़ा 57 प्रतिशत था। इसके साथ ही, इज़राइल के भविष्य को लेकर बहुत अधिक आशावादी छात्रों का अनुपात 37 प्रतिशत से घटकर 31 प्रतिशत रह गया है।

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