‘डिस्कवर इंडिया’ ने दो दशक पहले इसे चुना था एशिया का सबसे साफ़-सुथरा गाँव

भारत के मेघालय राज्य में बसा मावलिनॉन्ग, 2003 में ‘डिस्कवर इंडिया’ मैगज़ीन द्वारा एशिया का सबसे साफ़-सुथरा गाँव घोषित किए जाने के बाद पर्यटकों के लिए एक लोकप्रिय जगह बन गया।

भारत के सुदूर पूर्वोत्तर में बसे मावलिनॉन्ग पर बीबीसी की एक दिलचस्प रिपोर्ट बताती है कि एक छोटा सी कोशिश आपके इलाक़े को दुनिया के नक़्शे पर ला सकती है।

इस रिपोर्ट के मुताबिक़, भारत के सुदूर पूर्वोत्तर में बसे 600 लोगों के गाँव मावलिनॉन्ग में हर शनिवार को करीब एक हज़ार पर्यटक आते हैं। लोग यहाँ फूलों से सजी गलियों में घूमने, साफ़-सुथरी सड़कों पर सेल्फ़ी लेने और यह देखने आते हैं कि क्या यह गाँव उस ख़िताब के लायक है जिसने इसे पूरे भारत में एशिया का सबसे साफ़-सुथरा गाँव के रूप में मशहूर किया।

मगर इसमें कुछ बदलाव किए गए हैं। जनवरी 2026 से, गाँव में जाने वाली इकलौती सड़क पर बने काले मेटल के गेट हफ़्ते में एक दिन बंद कर दिए जाते हैं और वहाँ पहरा लगा दिया जाता है। गाँव वालों ने रविवार को दिन भर के लिए आने वाले पर्यटकों पर रोक लगाने का एक अप्रत्याशित फ़ैसला लिया है, जिससे पर्यटक और उनसे होने वाली कमाई दोनों ही रुक गए हैं।

जिस गाँव की किस्मत पर्यटन की वजह से बदली, वह गाँव हफ़्ते में एक दिन खुद को बाहरी लोगों से दूर क्यों रखना चाहेगा? इस सवाल पर गाँव वालों का कहना है कि, यह रोक उस चीज़ को वापस पाने की कोशिश है जिसे वे “असली गाँव की ज़िंदगी” कहते हैं।

भारत के मेघालय राज्य में बांग्लादेश की सीमा से कुछ किलोमीटर दूर बसा मावलिनॉन्ग, 2003 में ‘डिस्कवर इंडिया’ मैगज़ीन द्वारा एशिया का सबसे साफ़-सुथरा गाँव घोषित किए जाने के बाद पर्यटकों के लिए एक लोकप्रिय जगह बन गया। साफ़-सफ़ाई की कमी के लिए जाने जाने वाले देश में, यह कोई छोटी उपलब्धि नहीं है। लेकिन मावलिनॉन्ग में बच्चों को कम उम्र से ही साफ़-सफ़ाई रखना सिखाया जाता है; कई बच्चे स्कूल जाने से पहले हर सुबह सड़कों पर झाड़ू लगाते हैं, सूखी पत्तियाँ हटाते हैं और कूड़ेदान खाली करते हैं। गाँव वाले बायोडिग्रेडेबल कचरे (जो आसानी से सड़-गल जाता है) के निपटान का ध्यान रखते हैं और सार्वजनिक जगहों को सुंदर बनाने पर गर्व करते हैं।

2014 में अपना राष्ट्रीय ‘स्वच्छ भारत अभियान’ शुरू करने के कुछ समय बाद, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने रेडियो पर अपने संबोधन में इस गाँव की ओर और ज़्यादा लोगों का ध्यान खींचा। उन्होंने कहा, “साफ़-सफ़ाई बनाए रखना वहाँ के लोगों की आदत बन गई है।” “यह सब हममें भरोसा जगाता है कि देशवासियों की कोशिशों से हमारा देश ज़रूर साफ़-सुथरा बनेगा।”

इन तारीफों ने मावलिननॉन्ग को पूरे भारत में मशहूर कर दिया। यहाँ के लोगों ने खेती-बाड़ी छोड़कर टूरिज़्म का काम शुरू कर दिया और गेस्ट हाउस व रेस्टोरेंट खोल लिए। उन्होंने एक कार पार्किंग बनाई जिसके चारों ओर यादगार चीज़ों और चाय की दुकानें थीं, जो रोज़ाना आने वाली टूरिस्ट वैन में सवार पर्यटकों की सेवा करती थीं।

गाँव में पर्यटकों के आने की शुरुआत के दो दशक बाद, और सोशल मीडिया से नई पीढ़ी के आकर्षित होने के बाद, मावलिननॉन्ग की ग्राम समिति ने संतुलन बनाने का फ़ैसला किया और दिन भर के लिए आने वाले पर्यटकों पर रविवार को रोक लगा दी। निवासियों का कहना था कि इसका मुख्य कारण यह था कि इससे गाँव की ज़्यादातर ईसाई आबादी पर्यटकों की सेवा करने के बजाय रविवार को चर्च में समय बिता सकती थी।

समिति की सदस्य प्रेशियस खोंगडुप ने भारतीय मीडिया को बताया कि यह प्रस्ताव “गाँव की सांस्कृतिक पहचान और उस अनुशासन, जिसने मावलिननॉन्ग को खास बनाया था, दोनों को बनाए रखने के लिए” लाया गया था।

स्थानीय निवासी फेस्टिवल खारिम्बा, जो गाँव के बीच में बने बड़े बांस के रास्ते से गुज़रने के लिए पर्यटकों से 30 रुपये (23p) लेती हैं, ने कहा, “यह हमारे लिए अच्छा है।” उन्होंने आगे कहा, “हमारे पास चर्च जाने, प्रार्थना-सभा में शामिल होने और प्रार्थना करने का समय होता है। अगर रविवार को पर्यटक यहाँ हों, तो यह हमारे लिए समस्या है।”

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